सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अक्टूबर 2026 को सैन्य प्रशिक्षण के दौरान चोट या दिव्यांगता के कारण बाहर किए गए अधिकारी कैडेटों के लिए कल्याणकारी उपायों पर पुनर्विचार करने के अपने निर्देश का पालन न करने पर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, आर. महादेवन और डी. के. उपाध्याय की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी, जो स्वप्रेरित प्रकरण In Re: Cadets Disabled in Military Training Struggle [SMW(C) No. 6/2025] के रूप में दर्ज है।
न्यायालय ने दर्ज किया कि 4 अगस्त 2026 के उसके आदेश के अनुसार 2015 की सबरवाल समिति की सिफारिशों पर नई और अनुकूल पुनर्विचार प्रक्रिया नहीं की गई। पीठ ने केंद्र को एक और अवसर देते हुए उचित बैठक करने, उन सिफारिशों पर फिर से विचार करने और कार्यवृत्त अभिलेख पर रखने को कहा। मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर को सूचीबद्ध की गई है। पीठ ने चेतावनी दी कि लगातार अनुपालन न होने पर प्रतिकूल आदेश दिए जा सकते हैं, जिनमें परमादेश भी शामिल हो सकता है, हालांकि उसने अभी ऐसा आदेश जारी न करने की बात कही।
‘पुनर्विचार का कोई संकेत नहीं’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने केंद्र के रुख पर खुली अदालत में सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “आप अदालत के प्रति इतनी क्षीण-सी भावना क्यों दिखा रहे हैं? आप कहते हैं कि हमने इसे 2022 में निपटा दिया और बात खत्म। विभाग की ओर से यह कैसा रवैया है?”
पीठ ने पाया कि केंद्र के हलफनामे में केवल 2022 में हुई बैठकों का उल्लेख था और पहले लिए गए उन फैसलों को दोहराया गया था, जिनमें बाहर किए गए अधिकारी कैडेटों को दिव्यांगता पेंशन और पूर्व सैनिक का दर्जा देने से इनकार किया गया था। पीठ ने कहा कि 4 अगस्त के निर्देश के आलोक में किसी भी पुनर्विचार का “एक शब्द भी” नहीं है और यह “दिन की तरह स्पष्ट” है कि प्रतिवादी ने रिपोर्ट पर कोई पुनर्विचार नहीं किया। न्यायमूर्ति महादेवन ने भी कहा, “हमारे 4 अगस्त के निर्देश के अनुसार कोई पुनर्विचार नहीं हुआ है।”
4 अगस्त को न्यायालय ने प्रतिवादी विभागों को सबरवाल समिति की रिपोर्ट पर “बाहर किए गए कैडेटों की स्थिति सुधारने” के लिए पुनर्विचार करने को कहा था और यह अपेक्षा जताई थी कि उन विभागों से “कुछ अनुकूल सिफारिशें” आएंगी। 2015 की समिति ने अन्य उपायों के साथ प्रशिक्षण चोट के कारण बाहर किए गए अधिकारी कैडेटों के लिए पूर्व सैनिक का दर्जा और दिव्यांगता पेंशन की सिफारिश की थी। केंद्र ने 2022 में इन सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया था और अब भी वही रुख बनाए हुए है।
बाहर किए गए सिपाहियों से असमानता
पीठ ने कहा कि सामान्य भर्ती सैनिकों को बाहर किए जाने पर दिव्यांगता पेंशन और अन्य लाभ मिलते हैं, जबकि अधिकारी कैडेटों को नहीं। वरिष्ठ अधिवक्ता रेखा पल्ली, जो अमिकस क्यूरी हैं, ने इस असमानता की ओर ध्यान दिलाते हुए बताया कि कैडेट समानता की मांग कर रहे हैं। बताया गया कि कई वर्षों में लगभग 400 अधिकारी कैडेट बाहर किए गए हैं, यानी सालाना करीब 40।
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि मौजूदा नीति के तहत अधिकारी कैडेटों को पूर्व सैनिक का दर्जा या अधिकारी दरों पर दिव्यांगता पेंशन देना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि पेंशन का प्रश्न आठवें केंद्रीय वेतन आयोग में देखा जाएगा। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने पूछा कि अधिकारी कैडेटों के साथ भर्ती सैनिकों से अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है और वित्तीय प्रभावों पर स्पष्टता मांगी।
4 अगस्त के अपने आदेश में न्यायालय ने पहले ही मासिक दिव्यांगता या अनुग्रह राशि में अंतर को रेखांकित किया था। आदेश के अनुसार अधिकारी कैडेटों को 12,240 रुपये के साथ महंगाई भत्ता मिलता है, जबकि जवान भर्ती सैनिकों को 18,000 रुपये दिए जाते हैं। इस अंतर को आठवें वेतन आयोग के लिए छोड़ा गया था। उसी आदेश में अयोग्य घोषित कैडेटों को जीवनभर के लिए पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना का कवरेज बढ़ाने को “प्रशंसनीय कदम” बताया गया था।
कौशल पाठ्यक्रम, रोजगार नहीं
पुनर्वास के मुद्दे पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमण ने अदालत को बताया कि सरकार ने पुनर्वास महानिदेशालय के माध्यम से आठ से दस सप्ताह के रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम प्रस्तावित किए हैं। इनमें साइबर सुरक्षा, रसद, डेटा विश्लेषण और तकनीकी व्यवसायों जैसे क्षेत्र शामिल हैं। पाठ्यक्रम पूरा करने पर रोजगार की गारंटी नहीं होगी।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कम-से-कम शैक्षणिक सहायता देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “कम-से-कम शैक्षणिक खर्च तो दिया जाना चाहिए… हम यह नहीं कह रहे कि आप उन्हें स्नातक पाठ्यक्रम दें, कम-से-कम डिप्लोमा पाठ्यक्रम के लिए शैक्षणिक खर्च दिया जा सकता है, यदि वे भविष्य में रोजगार चाहते हैं।” इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने निर्देश लेने का आश्वासन दिया।
अमिकस क्यूरी से यह बताने को कहा गया कि बाहर किए गए भर्ती सैनिकों को अभी कौन-कौन से विशिष्ट लाभ मिलते हैं, ताकि अधिकारी कैडेटों के लिए समान सुविधाओं पर विचार किया जा सके। अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से यह भी कहा कि वे विभाग को अधिक संवेदनशील रुख अपनाने की आवश्यकता समझाएं।
पहले के निर्देश अब भी प्रभावी
यह कार्यवाही राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, भारतीय सैन्य अकादमी, अधिकारियों के प्रशिक्षण विद्यालय और अन्य पूर्व-नियुक्ति प्रशिक्षण संस्थानों से उन कैडेटों से जुड़ी है, जिन्हें प्रशिक्षण के दौरान हुई दिव्यांगता के बाद बाहर कर दिया गया। इनमें से कई, विशेषकर 40 प्रतिशत मानक से नीचे वाले, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की पूर्ण सुरक्षा के दायरे से बाहर रह जाते हैं।
4 अगस्त को न्यायालय ने कहा था कि मानक दिव्यांगता वाले बाहर किए गए कैडेट अधिनियम की धारा 34 के तहत 4 प्रतिशत आरक्षण के हकदार हैं। उसने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को “पूर्व-सैन्यकर्मी” कोटे के तहत, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की पूर्व सैनिक की परिभाषा से स्वतंत्र रूप से, उनके लिए आरक्षण पर विचार करने को भी कहा था। इसके साथ ही, केंद्र को उन कैडेटों के लिए उपयुक्त कल्याण योजना बनाने का निर्देश दिया गया था जिनकी दिव्यांगता 40 प्रतिशत से कम है। न्यायालय ने 2025 में स्वप्रेरित संज्ञान तब लिया था, जब रिपोर्टों में कहा गया कि ऐसे कैडेटों को सेवा-प्रशिक्षण के दौरान घायल होने के बावजूद दर्जा, पर्याप्त चिकित्सकीय सहायता या पुनर्वास नहीं मिल रहा था।