भारतीय सेना के हवलदार सावन बरवाल ने जापान के नागोया में 2026 एशियाई खेलों की पुरुष मैराथन में रजत पदक जीतकर भारतीय एथलेटिक्स में एक बड़ी उपलब्धि दर्ज की है। उन्होंने 2 घंटे 11 मिनट 37 सेकंड का नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाया।
28 वर्षीय लंबी दूरी के धावक, हिमाचल प्रदेश के निवासी बरवाल जापान के इचिकाता यामाशिता से पीछे रहे, जिन्होंने 2:10:49 के समय के साथ स्वर्ण पदक जीता। चीन के पेइयू फेंग ने 2:12:13 के समय के साथ कांस्य पदक हासिल किया।
बरवाल के प्रदर्शन से पुरुष मैराथन में एशियाई खेलों का भारत का 44 साल का पदक इंतजार खत्म हो गया। इससे पहले इस स्पर्धा में भारत का पिछला पदक 1982 में एच. के. सीथरन ने कांस्य के रूप में जीता था।
यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि नागोया बरवाल की केवल दूसरी प्रतिस्पर्धी मैराथन थी। उन्होंने 12 अप्रैल 2026 को एनएन मैराथन रॉटरडैम में मैराथन पदार्पण किया था, जहां उन्होंने 2:11:58 का समय निकाला और शिवनाथ सिंह के 1978 में बने 2:12:00 के लंबे समय से चले आ रहे भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तोड़ा था।
छह महीने से भी कम समय में बरवाल ने एशिया के सबसे बड़े खेल मंचों में से एक पर अपने ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड को 21 सेकंड से बेहतर कर लिया।
18 फरवरी 1998 को जन्मे बरवाल हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की जोगिंदरनगर तहसील के रड्डा भकहेड गांव से हैं। वह साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिता कुलदीप बरवाल नई दिल्ली में चालक के रूप में काम करते थे, जबकि उनकी माता सुभद्रा देवी गृहिणी हैं। उनके बड़े भाई सुमीत बरवाल भी भारतीय सेना में सेवा दे रहे हैं।
बरवाल की शुरुआती रुचि दौड़ में नहीं थी। बचपन में उनका झुकाव बैडमिंटन की ओर था और उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में करियर बनाने के बारे में भी सोचा था। एथलेटिक्स की ओर उनका सफर करीब 14 वर्ष की आयु में शुरू हुआ, जब वह अपने बड़े भाई के साथ स्थानीय ट्रैक पर गए और 1,500 मीटर के प्रशिक्षण सत्र में शामिल हुए।
उनकी क्षमता जल्द ही सामने आ गई और उन्होंने जोगिंदरनगर खेल प्रशिक्षण केंद्र में कोच गोपाल ठाकुर के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण शुरू किया। इसके बाद वर्षों तक ट्रैक पर प्रतिस्पर्धा करते हुए बरवाल ने 1,500 मीटर, 3,000 मीटर, 5,000 मीटर और 10,000 मीटर स्पर्धाओं में खुद को निखारा और अंततः सड़क दौड़ तथा मैराथन की ओर कदम बढ़ाया।
बरवाल 2019 में खेल कोटे के जरिए भारतीय सेना में शामिल हुए और वर्तमान में हवलदार के पद पर हैं। वे अतिरिक्त महानिदेशक, सैन्य सर्वेक्षण, इंजीनियर-इन-चीफ शाखा के अधीन 501 फील्ड सर्वे इंजीनियरिंग समूह से जुड़े हैं और उन्होंने पुणे स्थित सेना खेल संस्थान में व्यापक प्रशिक्षण लिया है।
विशेषज्ञ प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, पुनर्वास सहयोग और सैन्य अनुशासन सहित सेना का संगठित खेल वातावरण उनके एक शीर्ष सहनशक्ति धावक के रूप में विकास में महत्वपूर्ण रहा है।
मैराथन धावक बनने से पहले बरवाल भारत के प्रमुख लंबी दूरी के धावकों में स्थान बना चुके थे। उन्होंने 2022 की राष्ट्रीय ओपन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 10,000 मीटर में रजत और 2023 की एशियाई हाफ मैराथन चैंपियनशिप, दुबई में कांस्य पदक जीता था।
उनकी प्रगति 2024 फेडरेशन कप में 5,000 मीटर में स्वर्ण पदक के साथ जारी रही। 2025 में देहरादून में आयोजित 38वें राष्ट्रीय खेलों में उन्होंने 5,000 मीटर और 10,000 मीटर दोनों खिताब मीट रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ जीतकर यादगार दोहरा प्रदर्शन किया। इसके बाद 2025 एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप, गुमी में 10,000 मीटर में चौथे स्थान पर रहे।
मैराथन में उनका बदलाव बेहद सफल साबित हुआ। उनके शारीरिक सामर्थ्य, जिसमें लगभग 78–79 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम प्रति मिनट का वायु ग्रहण क्षमता स्तर बताया गया, को देखते हुए उनके कोचों ने 42.195 किलोमीटर की दूरी पर उनकी क्षमता परखने का निर्णय लिया।
रॉटरडैम में उनके पदार्पण ने तुरंत इतिहास रच दिया। बरवाल ने 2:11:58 का समय लेकर 1978 से चले आ रहे शिवनाथ सिंह के रिकॉर्ड को दो सेकंड से तोड़ दिया। इसी प्रदर्शन से उन्हें एशियाई खेलों के लिए भी योग्यता मिली।
रॉटरडैम के अंतिम क्षणों ने मैराथन दौड़ की शारीरिक सीमाओं को भी सामने रखा। बताया गया कि ठंडी और तेज हवा की परिस्थितियों में सिर पर पानी डालने के बाद अंतिम मीटरों में उन्हें दो बार थोड़े समय के लिए बेहोशी जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा। वे फिनिश से पहले दो बार गिरे, लेकिन दौड़ पूरी कर भारत के रिकॉर्ड पुस्तकों में जगह बनाई।
एशियाई खेलों ने यह पुष्टि की कि रॉटरडैम उनका केवल एक अलग प्रदर्शन नहीं था। नागोया में बरवाल ने न केवल अंतरराष्ट्रीय पदक हासिल किया, बल्कि भारतीय रिकॉर्ड को फिर से घटाकर 2:11:37 कर दिया।
उन्हें रिलायंस फाउंडेशन के प्रोजेक्ट 2:09 सहनशक्ति कार्यक्रम का समर्थन मिला है और उन्होंने अजित मार्कोस, मोहम्मद यूनुस खान और स्कॉट सिमंस जैसे कोचों तथा मार्गदर्शकों के साथ काम किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैराथन धावक के रूप में विकसित करने के प्रयास के तहत उनके प्रशिक्षण में ऊंचाई पर अभ्यास भी शामिल रहा है।
बरवाल ने पहले कहा था कि उनका लक्ष्य भविष्य में 2:05 से 2:08 के दायरे में दौड़ने का है। इससे स्पष्ट है कि उनके राष्ट्रीय रिकॉर्ड प्रदर्शन को अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि लंबी यात्रा के पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है।
उनकी उपलब्धियों ने एथलेटिक्स से बाहर भी पहचान दिलाई है। 2025 राष्ट्रीय खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने के बाद उन्हें 2026 में परिवार के साथ गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने का आमंत्रण मिला था।
मंडी की पहाड़ियों के एक गांव से एशियाई खेलों के पदक मंच तक पहुंचने वाला बरवाल का सफर एक दशक से अधिक की सहनशक्ति आधारित मेहनत का परिणाम है। भारतीय सेना की खेल व्यवस्था में उनकी प्रगति और ट्रैक दौड़ से मैराथन तक तेजी से हुआ उनका बदलाव उन्हें भारतीय लंबी दूरी की दौड़ के प्रमुख नामों में शामिल कर चुका है।
अपने पहले ही दो मैराथनों में दो राष्ट्रीय रिकॉर्ड और एशियाई खेलों का रजत पदक हासिल कर हवलदार सावन बरवाल अपनी पीढ़ी के सबसे महत्वपूर्ण भारतीय सहनशक्ति एथलीटों में उभरे हैं।