वेलिंगटन में 23 अक्टूबर 2026 को टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के अध्यक्ष और टाटा संस के वरिष्ठ सलाहकार बन्माली अग्रवाला ने रक्षा सेवा स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन में “रक्षा औद्योगिक प्रौद्योगिकीय आधार (डीआईटीबी) – आत्मनिर्भर भारत” विषय पर संबोधन दिया। उन्होंने स्वदेशी रक्षा क्षमताओं, तकनीकी नवाचार और भारतीय उद्योग तथा सशस्त्र बलों के बीच मजबूत सहयोग के महत्व पर जोर दिया।
सत्र के दौरान अग्रवाला ने रक्षा निर्माण और प्रौद्योगिकी विकास में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की यात्रा पर उद्योग का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने देश के रक्षा औद्योगिक प्रौद्योगिकीय आधार को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम की जा सके और भारत की सामरिक स्वायत्तता बढ़ाई जा सके।
उन्होंने अपने संबोधन में अत्याधुनिक तकनीकों, स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास तथा निरंतर उद्योग सहयोग के उपयोग के महत्व को रेखांकित किया। उनके अनुसार, यह सहयोग एक ऐसे भविष्य-तैयार रक्षा तंत्र के निर्माण में मदद करेगा, जो भारतीय सशस्त्र बलों की बदलती परिचालन आवश्यकताओं को पूरा कर सके।
चर्चा का एक प्रमुख विषय रक्षा सेवाओं और घरेलू उद्योगों के बीच साझेदारी का बढ़ता महत्व रहा। अग्रवाला ने बताया कि निकट सहयोग से नवाचार की गति तेज हो सकती है, उन्नत सैन्य प्रौद्योगिकियों के विकास को समर्थन मिल सकता है और भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता मजबूत हो सकती है।
उन्होंने सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल में भारतीय उद्योग की भूमिका पर भी प्रकाश डाला, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी विकास, नवाचार और एक मजबूत घरेलू रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में निवेश के माध्यम से।
रक्षा औद्योगिक प्रौद्योगिकीय आधार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह सैन्य उपकरणों और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के स्वदेशी विकास, उत्पादन और रखरखाव को संभव बनाता है। इस तंत्र को मजबूत करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आधुनिक युद्ध अब उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त प्रणालियों और अन्य उभरती प्रौद्योगिकियों पर अधिक निर्भर होता जा रहा है।
रक्षा सेवा स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन में हुई इस बातचीत ने भारत के रक्षा आधुनिकीकरण में उद्योग की भूमिका और प्रौद्योगिकीय नवाचार को सशस्त्र बलों की परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के महत्व पर विचार का अवसर दिया।
इस सत्र ने सैन्य, अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योग के बीच सतत सहयोग के महत्व को भी मजबूत किया, ताकि रक्षा प्रौद्योगिकी और निर्माण में अधिक आत्मनिर्भरता हासिल करने के भारत के दीर्घकालिक लक्ष्य को आगे बढ़ाया जा सके।