पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक पूर्व सैनिक की नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया है, जिस पर पाकिस्तान स्थित खुफिया एजेंसियों से लगातार संपर्क रखने और भारतीय सेना की गतिविधियों, युद्ध की तैयारियों तथा सैन्य संरचनाओं से जुड़ी गोपनीय जानकारी पैसे के बदले इकट्ठा कर भेजने का आरोप है। न्यायमूर्ति मनीषा बत्रा ने 6 अगस्त 2026 के आदेश में कहा कि आरोप गंभीर हैं, जांच के दौरान एकत्र सामग्री महत्वपूर्ण है और व्यापक जनहित को देखते हुए इस चरण में जमानत देना उचित नहीं है।
यह पूर्व सैनिक लगभग 17 वर्ष भारतीय सेना में सेवा दे चुका था। उसके वकील ने उसकी सेवा को बेदाग बताया था। वह इस समय वायुसेना स्टेशन, बीकानेर में रक्षा सेवा कोर के साथ तैनात है। अदालत ने दर्ज किया कि उस पर सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों के जरिए पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों से संपर्क बनाने और सेना से अपने पुराने संबंधों का उपयोग कर देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता से जुड़ी संवेदनशील जानकारी जुटाकर आगे बढ़ाने का आरोप है।
मामले की पृष्ठभूमि और जांच के निष्कर्ष
अभियोजन के अनुसार, एक गुप्त सूत्र ने अमृतसर स्थित राज्य विशेष अभियान प्रकोष्ठ से संपर्क कर जानकारी दी थी कि पूर्व सैनिक सोशल मीडिया के जरिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के संपर्क में है। आरोप है कि वह भारतीय सेना में अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल कर बलों की गतिविधियों और अन्य संवेदनशील सूचनाओं की जानकारी जुटाता था और फिर उसे पाकिस्तान को आर्थिक लाभ के बदले भेजता था।
यह भी आरोप लगाया गया कि संबंधित दिन उसे अमृतसर छावनी क्षेत्र में बढ़ी हुई सेना की गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी दी गई थी। सूचना के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई और जांच शुरू हुई। आरोपी को 7 फरवरी को गिरफ्तार किया गया। याचिका में यह भी उल्लेख था कि नियमित जमानत याचिका के संदर्भ में वह 7 जुलाई से हिरासत में है। जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र अदालत में दाखिल कर दिया गया है।
जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि याचिकाकर्ता फोन पर पाकिस्तान स्थित खुफिया एजेंसियों के लगातार संपर्क में था। अदालत ने कहा कि सामग्री यह दर्शाती है कि संपर्क किसी एक बार की या अस्पष्ट बातचीत तक सीमित नहीं था, बल्कि लगातार संवाद बना हुआ था।
बचाव पक्ष के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता कुलजीत सिंह बल ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को झूठा फंसाया गया है। उन्होंने पूर्व सैनिक की लगभग 17 वर्ष की लंबी और बेदाग सैन्य सेवा पर जोर दिया। वकील ने कहा कि आरोपी को किसी प्रतिबंधित या संवेदनशील सैन्य क्षेत्र से नहीं पकड़ा गया, बल्कि उसे कथित तौर पर एक विवाह समारोह से अवैध तरीके से उठाया गया था।
बचाव पक्ष ने कहा कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप अस्पष्ट और सामान्य हैं। इनमें यह नहीं बताया गया कि कथित रूप से कौन-सी गोपनीय जानकारी साझा की गई, उसे भेजने का सटीक तरीका क्या था, या किसी विदेशी एजेंसी से संवाद का कोई ठोस उदाहरण क्या है। वकील के अनुसार, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि कोई गुप्त सूचना वास्तव में भेजी गई। 3,000 रुपये मिलने के आरोप को भी चुनौती दी गई और कहा गया कि यह राशि किसी ज्ञात व्यक्ति से आई थी, न कि किसी पाकिस्तानी हैंडलर से।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि जांच पूरी हो चुकी है, आरोपपत्र दाखिल हो गया है और हिरासत में पूछताछ की अब आवश्यकता नहीं है। ऐसे में आगे हिरासत में रखना किसी उपयोग का नहीं होगा। इसी आधार पर जमानत मांगी गई।
अभियोजन का विरोध और अदालत का तर्क
अतिरिक्त महाधिवक्ता साक्षी बख्शी ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि आरोप गंभीर और स्पष्ट हैं। जांच से यह स्थापित हुआ है कि पाकिस्तान आधारित खुफिया एजेंसियों से फोन पर लगातार संपर्क था। आरोपों की गंभीरता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर उनके सीधे प्रभाव को देखते हुए, इस चरण में नियमित जमानत का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति मनीषा बत्रा ने मामले की गंभीरता पर अभियोजन के आकलन से सहमति जताई। आदेश में कहा गया कि जांच के दौरान यह पाया गया है कि याचिकाकर्ता फोन पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के लगातार संपर्क में था। अदालत ने कहा कि आरोप काफी गंभीर हैं और जांच के दौरान एकत्र सामग्री तथा व्यापक जनहित को देखते हुए इस समय नियमित जमानत देना उपयुक्त नहीं है।
अदालत ने दोहराया कि आरोपों की गंभीरता, जांच सामग्री की प्रकृति और व्यापक जनहित जमानत देने के विरुद्ध हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि आदेश में कही गई कोई भी बात मामले के गुण-दोष पर राय के रूप में न ली जाए। निचली अदालत को स्वतंत्र रूप से और उच्च न्यायालय की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना आगे की कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए।
बड़ा संदर्भ और असर
सेवारत या सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों और विदेशी खुफिया एजेंसियों, विशेषकर पाकिस्तान की एजेंसियों, के बीच कथित संपर्क से जुड़े मामले भारतीय अदालतों के समक्ष बार-बार आते रहे हैं। ऐसे मामलों में ऑपरेशनल सुरक्षा, सैनिकों की आवाजाही और राष्ट्रीय अखंडता पर संभावित खतरे के कारण जांच और न्यायिक परीक्षण अधिक सख्ती से किया जाता है।
रक्षा से जुड़ी सूचनाओं तक पहले या वर्तमान में पहुंच रखने वाले व्यक्तियों के मामले में अदालतें सामान्यतः जनहित और राष्ट्रीय सुरक्षा को जमानत के चरण में महत्वपूर्ण मानती हैं। फोन और सोशल मीडिया आधारित संपर्क हाल की जांचों में बार-बार सामने आए हैं, जिनमें कथित रूप से हैंडलर ऐसे व्यक्तियों से संपर्क बनाए रखते हैं जो रक्षा से जुड़ी जानकारी तक पहुंच रखते हैं या रख चुके हैं।
जमानत से इनकार का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं है। आरोपी को निर्दोष माने जाने की कानूनी धारणा बनी रहती है और मुकदमे में साक्ष्यों के आधार पर ही आरोपों की सच्चाई तय होगी। फिलहाल मामला दाखिल आरोपपत्र के आधार पर निचली अदालत में आगे बढ़ेगा और आगे की स्थिति मुकदमे में पेश किए जाने वाले साक्ष्यों पर निर्भर करेगी।