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Home - भारतीय थलसेना - कोबरा बटालियन से ओटीए गया तक: CRPF के उपनिरीक्षक लेफ्टिनेंट रघवेंद्र झा की कहानी

भारतीय थलसेना

कोबरा बटालियन से ओटीए गया तक: CRPF के उपनिरीक्षक लेफ्टिनेंट रघवेंद्र झा की कहानी

SSBCrack News Desk
Last updated: सितम्बर 3, 2026 12:22 अपराह्न
SSBCrack News Desk
Published: सितम्बर 3, 2026
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OC Raghvendra Jha

दरभंगा, बिहार में जन्मे अधिकारी कैडेट राघवेंद्र झा का जीवन समर्पण, दृढ़ता और राष्ट्रसेवा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की कहानी है। उनके दादा, पिता और चाचा की सैन्य विरासत से प्रेरित होकर उन्होंने कम उम्र में ही वर्दी पहनकर देश की सेवा करने का संकल्प लिया था।

हालांकि, सेना अधिकारी बनने तक उनकी यात्रा सामान्य नहीं रही। अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी, गया में प्रशिक्षण से पहले झा केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में उप-निरीक्षक के रूप में कार्य कर चुके थे और कठिन परिचालन परिस्थितियों में सेवा दे चुके थे। सीआरपीएफ से भारतीय सेना की ओर उनका यह कदम अधिक जिम्मेदारी निभाने की निरंतर इच्छा को दर्शाता है।

राष्ट्रीय कैडेट कोर के सक्रिय कैडेट और क्षेत्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे झा ने अपने प्रारंभिक वर्षों में अनुशासन, टीमवर्क और प्रतिस्पर्धी भावना विकसित की। एनसीसी से उनका जुड़ाव उन्हें सशस्त्र बलों से जोड़ने और देशसेवा की शुरुआती प्रेरणा को मजबूत करने में अहम रहा।

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सुरक्षा बलों में आने से पहले झा ने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत जावा डेवलपर के रूप में की थी। तकनीकी क्षेत्र से सीआरपीएफ के चुनौतीपूर्ण परिचालन करियर में उनका बदलाव एक बड़ा पेशेवर मोड़ था। वर्ष 2023 में सीआरपीएफ में उप-निरीक्षक के रूप में शामिल होकर उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा को समर्पित करियर की दिशा में पहला बड़ा कदम उठाया।

सीआरपीएफ में उनकी सेवा ने उन्हें कठिन परिचालन क्षेत्रों का प्रत्यक्ष अनुभव दिया। उन्होंने ओडिशा के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग के उग्रवाद प्रभावित माहौल में कार्य किया। इन तैनातियों ने उन्हें जटिल और संवेदनशील क्षेत्रों में कार्यरत सुरक्षा कर्मियों की चुनौतियों की गहरी समझ दी।

सीआरपीएफ करियर में उनके प्रदर्शन को मान्यता भी मिली। वर्ष 2025 में उन्हें प्रतिष्ठित डीजी सीआरपीएफ प्रशंसा-पत्र मिला। यह सम्मान उनकी सेवा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा और बल में उनके योगदान तथा प्रदर्शन को रेखांकित करता है।

परिचालन जिम्मेदारियों के अलावा झा ने खेलों से भी अपना जुड़ाव बनाए रखा। सीआरपीएफ सेवा के दौरान उन्होंने विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में बल का प्रतिनिधित्व किया और वॉलीबॉल में कई उपलब्धियां हासिल कीं। उनके ये खेल उपलब्धियां उनकी परिचालन सेवा के साथ-साथ टीमवर्क, अनुशासन, प्रतिस्पर्धी भावना और आपसी सौहार्द को भी मजबूत करती रहीं।

झा के लिए सीआरपीएफ का समय सेना अधिकारी बनने की बड़ी महत्वाकांक्षा की ओर एक महत्वपूर्ण सीढ़ी साबित हुआ। परिचालन क्षेत्रों में मिले अनुभव ने उन्हें जमीनी परिस्थितियों की व्यावहारिक समझ दी और सैन्य नेतृत्व की जिम्मेदारी लेने की इच्छा को और मजबूत किया।

ओलिव ग्रीन वर्दी पहनने की उनकी चाह एनसीसी से जुड़े शुरुआती अनुभवों से शुरू हुई थी। सीआरपीएफ की सेवा ने इस चाह को अधिक परिपक्व और दृढ़ लक्ष्य में बदल दिया। परिचालन सेवा का प्रत्यक्ष अनुभव लेने के बाद उन्होंने भारतीय सेना में आयोग प्राप्त करने के लिए सशस्त्र बल चयन बोर्ड का सामना करने का निर्णय लिया।

उन्होंने सशस्त्र बल चयन बोर्ड को सफलतापूर्वक पास किया और अधिकारी प्रशिक्षण के लिए ओटीए गया में प्रवेश का अवसर पाया। उनके लिए अकादमी तक पहुंचना वर्षों की आकांक्षा, तैयारी और सेवा अनुभव का परिणाम था, साथ ही यह उनके सैन्य जीवन के एक नए चरण की शुरुआत भी थी।

ओटीए गया में झा ने अपनी पिछली सेवा से विकसित गुणों को बनाए रखा है। उन्होंने अकादमी की वॉलीबॉल टीम की कप्तानी संभाली और कई टीम खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। खेलों में उनकी भागीदारी और नेतृत्व ने टीमवर्क के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और साथी कैडेटों के साथ मिलकर काम करने की क्षमता को दिखाया।

खेल उनकी यात्रा का लगातार हिस्सा रहे हैं। सीआरपीएफ में वॉलीबॉल प्रतियोगिताओं में प्रतिनिधित्व करने से लेकर ओटीए गया की वॉलीबॉल टीम की कप्तानी तक, उनकी उपलब्धियों ने नेतृत्व, अनुशासन और टीम भावना का समानांतर प्रमाण प्रस्तुत किया है।

उनकी यात्रा यह भी बताती है कि भविष्य के सैन्य नेताओं को गढ़ने में पहले के परिचालन अनुभव की कितनी अहम भूमिका होती है। अधिकारी प्रशिक्षण में आने से पहले कठिन परिस्थितियों में सीआरपीएफ उप-निरीक्षक के रूप में सेवा देने के कारण झा परिचालन यथार्थ की ऐसी समझ लेकर आए हैं, जो ओटीए गया में दी जा रही नेतृत्व और सैन्य प्रशिक्षण को और सशक्त बनाती है।

गैर-वर्दीधारी तकनीकी पेशे से सीआरपीएफ और फिर अधिकारी आयोग की ओर उनका सफर उनके करियर के सुनियोजित विकास को दर्शाता है। यह मार्ग बताता है कि राष्ट्रसेवा की प्रेरणा अलग-अलग रूप ले सकती है और किसी एक सुरक्षा संगठन में मिला पेशेवर अनुभव दूसरी जगह बड़ी जिम्मेदारियों के लिए मजबूत आधार बन सकता है।

तीन पीढ़ियों की सैन्य प्रेरणा से जुड़े इस व्यक्ति की कहानी एक पुराने सपने के व्यक्तिगत उपलब्धि में बदलने की भी है। दादा, पिता और चाचा की विरासत का केवल अनुसरण करने के बजाय झा ने सीआरपीएफ सेवा और अधिकारी प्रशिक्षण के लिए चयन के माध्यम से अपनी अलग सेवा-पहचान बनाई है।

ओडिशा और अनंतनाग में उनका परिचालन अनुभव, डीजी सीआरपीएफ प्रशंसा-पत्र और खेलों में उपलब्धियां मिलकर उस व्यक्तित्व को आकार देती हैं जिसे वे अब ओटीए गया में लेकर आए हैं। अकादमी में इन अनुभवों को औपचारिक सैन्य प्रशिक्षण के साथ जोड़ा जा रहा है, ताकि सेना अधिकारी के लिए आवश्यक नेतृत्व गुण विकसित किए जा सकें।

झा दृढ़ता से मानते हैं कि “सेवा पहले, स्वयं बाद में” केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। यही सोच उनकी यात्रा के विभिन्न चरणों को जोड़ती है, जिसमें एनसीसी के दिन, पेशेवर जीवन, सीआरपीएफ सेवा और वर्तमान में ओटीए गया में प्रशिक्षण शामिल है।

उनकी कहानी सुविधा के बजाय सेवा चुनने और बड़े लक्ष्य को लगातार साधते रहने की है। जावा डेवलपर से लेकर कठिन परिचालन क्षेत्रों में सीआरपीएफ उप-निरीक्षक और अब सेना अधिकारी बनने का प्रशिक्षण ले रहे राघवेंद्र झा का सफर दृढ़ संकल्प और बार-बार स्वयं को चुनौती देने की इच्छा को दर्शाता है।

ओटीए गया में आगे बढ़ते हुए सीआरपीएफ से मिला अनुभव, परिवार से प्राप्त मूल्य और एनसीसी तथा खेलों से विकसित अनुशासन उनके भविष्य के सैन्य जीवन की मजबूत आधारशिला बनेंगे। कोबरा बटालियन के वातावरण से अधिकारी प्रशिक्षण स्थल तक उनकी यात्रा न केवल वर्दी बदलने का प्रतीक है, बल्कि राष्ट्रसेवा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के निरंतर बने रहने का भी संकेत देती है।

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