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Home - डिफेन्स न्यूज़ - मेजर जनरल की पत्नी से छेड़छाड़ पर सेना के हवलदार बर्खास्त, एक साल की जेल

डिफेन्स न्यूज़

मेजर जनरल की पत्नी से छेड़छाड़ पर सेना के हवलदार बर्खास्त, एक साल की जेल

SSBCrack News Desk
Last updated: जुलाई 31, 2026 9:56 पूर्वाह्न
SSBCrack News Desk
Published: जुलाई 31, 2026
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Army Havildar Dismissed, Sentenced to One Year in Jail for Molesting Major General’s Wife

भारतीय सेना के एक हवलदार को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है और एक सैन्य स्टेशन पर सेवारत मेजर जनरल की पत्नी के साथ छेड़छाड़ के दोष में उसे एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है। यह सैनिक वॉशरमैन के रूप में कार्यरत था और एक तोपखाना रेजिमेंट से संबद्ध था।

Contents
  • घटना मंदिर परिसर के पास हुई बताई गई
  • सैनिक ने आरोप स्वीकार किए होने का दावा
  • अधिकांश साक्ष्य विवादित नहीं थे
  • स्वतंत्र बोर्ड के समक्ष भी स्वीकारोक्ति दर्ज
  • त्वरित निस्तारण की आवश्यकता का हवाला
  • रक्षा पक्ष ने सुनवाई की निष्पक्षता पर सवाल उठाए
  • समरी कोर्ट मार्शल और जिला कोर्ट मार्शल में अंतर

उस पर सेना अधिनियम की धारा 69 के तहत अभियोग चलाया गया था, जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 74 के अंतर्गत दंडनीय एक नागरिक अपराध से जुड़ा है। समरी कोर्ट मार्शल की कार्यवाही उसके कमांडिंग ऑफिसर ने की थी।

घटना मंदिर परिसर के पास हुई बताई गई

मेजर जनरल की पत्नी ने कोर कमांडर को दी शिकायत में कहा कि हवलदार को अधिकारी के आधिकारिक आवास पर तैनात किया गया था और उसे परिसर में स्थित एक मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी दी गई थी।

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महिला के अनुसार वह 19 मई 2026 की सुबह मंदिर में प्रार्थना करने गई थीं, जहां हवलदार पहले से मौजूद था। उन्होंने आरोप लगाया कि सैनिक ने पीछे से आकर उन्हें पकड़ लिया और अश्लील हरकत करने की कोशिश की।

जब उन्होंने शोर मचाने की कोशिश की, तो आरोप है कि उसने उनका मुंह हाथों से ढकने का प्रयास किया ताकि वे चिल्ला न सकें। शिकायतकर्ता ने कहा कि वह किसी तरह उसके चंगुल से छूटकर आवासीय भवन की ओर भागीं।

इसके बाद हवलदार के पीछे आने की बात कही गई, लेकिन पास मौजूद गार्ड कमांडर और अन्य सैन्यकर्मियों ने उसे रोककर पकड़ लिया। आरोप-पत्र में कहा गया कि उसने पीछे से महिला को पकड़कर और मुंह ढकने का प्रयास करके अश्लीलता भड़काने की नीयत से आपराधिक बल का प्रयोग किया।

सैनिक ने आरोप स्वीकार किए होने का दावा

सैन्य कार्यवाही के दौरान हवलदार ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि वह मेजर जनरल के आवास पर तैनात था और घटना की सुबह मंदिर में ड्यूटी कर रहा था। 24 मई को दर्ज बयान में उसने शिकायतकर्ता के आरोप को भी मान लेने की बात कही गई।

हवलदार ने यह भी दावा किया कि घटना के बाद गार्डों ने उसे घेरकर पीटा। उसके अनुसार उसके सिर से खून बह रहा था और वह सदमे में चला गया, जिसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया। उसने कहा कि यह स्पष्ट नहीं कर सका कि उसे पत्थर से मारा गया या लकड़ी के डंडे से।

समरी कोर्ट मार्शल करने वाले कमांडिंग ऑफिसर ने नोट किया कि हवलदार को अप्रैल 2026 से मंदिर की देखरेख और रखरखाव की जिम्मेदारी नियमित रूप से दी जा रही थी।

अधिकांश साक्ष्य विवादित नहीं थे

कमांडिंग ऑफिसर ने निष्कर्ष निकाला कि प्रथम दृष्टया आरोप भारतीय न्याय संहिता की धारा 74 तथा सेना अधिनियम की धारा 69 के तहत अपराध बनता है। कोर्ट मार्शल रिकॉर्ड के अनुसार प्रारंभिक कार्यवाही में पेश किए गए साक्ष्यों का एक बड़ा हिस्सा विवादित नहीं रहा।

कमांडिंग ऑफिसर ने कहा कि सेना नियम 22 के तहत हुई सुनवाई में आरोपी ने लिखित और हस्ताक्षरित बयान दिया था, जिसमें उसने आरोप पत्र में वर्णित कृत्य को स्वीकार करने की बात कही गई।

यह भी बताया गया कि आरोप की सुनवाई के दौरान हवलदार ने अभियोजन पक्ष के गवाहों से जिरह नहीं की। सेना नियम 22 सामान्य रूप से सेना अधिनियम के अधीन व्यक्ति के विरुद्ध आरोपों की सुनवाई से संबंधित है, जिसके बाद आगे अनुशासनात्मक या कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू होती है।

स्वतंत्र बोर्ड के समक्ष भी स्वीकारोक्ति दर्ज

बाद में सैनिक का स्वैच्छिक बयान ब्रिगेड मुख्यालय द्वारा गठित अधिकारियों के बोर्ड के समक्ष दर्ज किया गया। सेना अधिकारियों ने कथित तौर पर यह सुनिश्चित किया कि बयान स्वेच्छा से और लागू सेना आदेशों के अनुसार दिया गया था।

इस प्रक्रिया की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई और रिकॉर्डिंग वाली मूल मेमोरी कार्ड को आधिकारिक अभिलेख का हिस्सा बनाया गया।

स्वैच्छिक बयान में हवलदार ने अपने 24 वर्षों की पूर्ववर्ती निष्कलंक सैन्य सेवा का उल्लेख किया। उसने आरोप स्वीकार करने, पछतावा और शर्म व्यक्त करने, बिना शर्त माफी मांगने और क्षमा चाहने की बात भी कही।

कमांडिंग ऑफिसर के अनुसार आरोपी ने तीन अलग-अलग अवसरों पर अपराध स्वीकार किया। पहली स्वीकारोक्ति सेना नियम 22 की कार्यवाही के दौरान कमांडिंग ऑफिसर के सामने, दूसरी संबंधित सेना आदेश के तहत गठित स्वतंत्र अधिकारियों के बोर्ड के समक्ष और तीसरी सेना नियम 23(3) के तहत साक्ष्य की संक्षिप्त सुनवाई में दी गई।

कमांडिंग ऑफिसर ने कहा कि इन स्वीकारोक्तियों की पुष्टि तीन अभियोजन गवाहों की गवाही से हुई और मामले के तथ्यों पर कोई महत्वपूर्ण विवाद नहीं था। उपलब्ध बयानों और साक्ष्यों के आधार पर समरी कोर्ट मार्शल ने हवलदार को दोषी ठहराते हुए सेना सेवा से बर्खास्त कर दिया और एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

त्वरित निस्तारण की आवश्यकता का हवाला

समरी कोर्ट मार्शल करने के निर्णय को समझाते हुए कमांडिंग ऑफिसर ने कहा कि यह घटना पीड़िता की गरिमा और व्यक्तिगत सुरक्षा के गंभीर उल्लंघन से जुड़ी थी, वह भी उसके अपने आवासीय परिसर में।

उन्होंने कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों का निस्तारण शीघ्र और गोपनीय तरीके से होना चाहिए, ताकि पीड़िता को और अधिक मानसिक आघात न हो। उनके अनुसार अनावश्यक देरी से महिला की पीड़ा बढ़ सकती थी और सेना के भीतर महिलाओं की गरिमा तथा सुरक्षा की रक्षा के प्रति विश्वास कमजोर पड़ सकता था।

कमांडिंग ऑफिसर ने माना कि बिना लंबी कार्यवाही के मामले का निपटारा करने के लिए समरी कोर्ट मार्शल सबसे त्वरित और प्रभावी तरीका था।

रक्षा पक्ष ने सुनवाई की निष्पक्षता पर सवाल उठाए

हवलदार के वकील आनंद कुमार ने कार्यवाही के तरीके को चुनौती दी है। उनका कहना था कि सैनिक को सेना अधिनियम की धारा 69 के तहत आरोपित नागरिक अपराध के लिए समरी कोर्ट मार्शल में नहीं चलाया जाना चाहिए था।

उन्होंने दावा किया कि शिकायतकर्ता वरिष्ठ सेना अधिकारी की पत्नी होने के कारण मामले को तेजी से निपटाया गया। वकील ने यह भी आरोप लगाया कि कार्यवाही चलाने के लिए कोई उचित संदर्भ आदेश जारी नहीं किया गया था।

रक्षा पक्ष के अनुसार मामला जिला कोर्ट मार्शल के सामने जाना चाहिए था, जहां आरोपी को अधिक विस्तृत सुनवाई प्रक्रिया का लाभ मिल सकता था। कुमार ने आगे कहा कि सैनिक का दोष स्वीकार करने वाला कथन इसीलिए दर्ज किया गया ताकि पूर्ण कोर्ट मार्शल में शिकायतकर्ता को रक्षा वकीलों की जिरह का सामना न करना पड़े।

उनका कहना था कि जिला कोर्ट मार्शल में आरोपी को आरोपों का अधिक निष्पक्ष ढंग से सामना करने, अभियोजन साक्ष्य की जांच करने और गवाहों से जिरह करने का अवसर मिलता।

समरी कोर्ट मार्शल और जिला कोर्ट मार्शल में अंतर

समरी कोर्ट मार्शल सेना अधिनियम के तहत अधिकृत सैन्य मुकदमे का एक रूप है। इसे सामान्यतः आरोपी के कमांडिंग ऑफिसर द्वारा किया जाता है और इसका उद्देश्य कुछ अनुशासनात्मक मामलों का अपेक्षाकृत शीघ्र निपटारा करना होता है।

इसके विपरीत जिला कोर्ट मार्शल अधिकारियों के एक पैनल द्वारा संचालित किया जाता है और इसमें आम तौर पर अधिक व्यापक प्रक्रिया-सुरक्षा होती है, जिसमें कानूनी प्रतिनिधित्व, गवाहों की जांच और बचाव पक्ष की दलील प्रस्तुत करने का व्यापक अवसर शामिल रहता है।

इसलिए रक्षा पक्ष की आपत्तियां केवल दोषसिद्धि पर ही नहीं, बल्कि इस पर भी केंद्रित हैं कि क्या नागरिक अपराध और संभावित कारावास वाली इस आरोपित घटना के लिए समरी कोर्ट मार्शल उपयुक्त मंच था।

दूसरी ओर सेना अधिकारियों ने आरोपी की कथित बार-बार की स्वीकारोक्ति, गवाहों के बयानों और मामले को बिना अनावश्यक देरी के निपटाने की आवश्यकता पर भरोसा किया। दोषसिद्धि, बर्खास्तगी और कारावास अब भी सैन्य कानून के तहत उपलब्ध समीक्षा, पुष्टि और पश्च-न्यायिक उपायों के अधीन बने हुए हैं।

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SSBCrack की संपादकीय टीम में अनुभवी पत्रकार, पेशेवर कंटेंट लेखक और समर्पित रक्षा अभ्यर्थी शामिल हैं, जिन्हें सैन्य मामलों, राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीति का गहरा ज्ञान है।
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