दिल्ली उच्च न्यायालय ने लगभग 28 साल बाद एक सेवानिवृत्त भारतीय सेना के अधिकारी, कैप्टन जे के वर्मा (सेवानिवृत्त) की विकलांगता पेंशन बहाल कर दी है। अदालत ने यह निर्णय सुनाते हुए कहा कि एक बार यदि विकलांगता को स्थायी घोषित किया गया है, तो इसे बिना नये चिकित्सा आकलन के कम नहीं किया जा सकता।
न्यायालय का प्रमुख अवलोकन
जस्टिस वी कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह की पीठ ने कहा कि:
- जब एक विकलांगता को जीवन के लिए स्थायी आंका जाता है, तो इसे मनमाने ढंग से नहीं बदला जा सकता।
- किसी भी कटौती का समर्थन एक नए चिकित्सा बोर्ड के आकलन द्वारा होना चाहिए।
- प्रशासनिक प्राधिकारियों को चिकित्सा निष्कर्षों को विशेषज्ञ चिकित्सकीय राय के बिना नहीं बदलने का अधिकार नहीं होता।
अदालत ने 1998 में विकलांगता प्रतिशत में की गई कमी को “कानून में अस्थिर” कहा।
मामले की पृष्ठभूमि
कैप्टन वर्मा को 1979 में सैन्य सेवा से संबंधित फेफड़ों के तपेदिक के कारण अवकाश प्राप्त किया गया था। उन्हें प्रारंभ में 100% विकलांगता पेंशन दी गई थी। 1993 में, एक चिकित्सा बोर्ड ने विकलांगता को 20% (स्थायी) के रूप में निर्धारित किया। लेकिन 1998 में, प्राधिकारियों ने बिना किसी नए चिकित्सा बोर्ड के इसे 11–14% में कम कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप पेंशन की समाप्ति हो गई।
ट्रिब्यूनल और कानूनी लड़ाई
अधिकारी ने सशस्त्र बल सदस्य न्यायाधिकरण (AFT) का दरवाजा खटखटाया, जिसने:
- 20% विकलांगता पर पेंशन बहाल की।
- जीवन भर के लिए 50% का चौड़ा बैंडिंग दी।
सरकार ने इस निर्णय को चुनौती दी, जिसके परिणामस्वरूप उच्च न्यायालय का यह निर्णय आया।
न्यायालय का अंतिम निर्देश
दिल्ली उच्च न्यायालय ने आदेश दिया:
- 23 फरवरी 1998 से 20% विकलांगता पेंशन को बहाल किया जाए।
- 2014 से लागू चौड़ा बैंडिंग 50% केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार।
- 3 महीनों के भीतर संशोधित पेंशन पेमेंट ऑर्डर (PPO) जारी किए जाएं।
- 3 महीनों के भीतर बकाया का भुगतान किया जाए, अन्यथा 6% वार्षिक ब्याज लागू होगा।
निर्णय का महत्व
यह निर्णय इस बात की पुष्टि करता है कि:
- चिकित्सा आकलन विकलांगता मामलों में प्राथमिकता रखते हैं।
- पेंशन लाभ में बदलाव से पहले उचित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
- पूर्व सैनिकों के अधिकारों को प्रशासनिक निर्णयों के माध्यम से सीमित नहीं किया जा सकता।
एक लंबा कानूनी सफर
यह मामला अधिकारी की चार दशकों की सेवा संबंधित कानूनी लड़ाई का समापन है, जो यह दर्शाता है कि पूर्व सैनिकों को उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करते समय कितनी प्रणालीगत चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।