केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के 800 से अधिक सेवारत ग्रुप ए अधिकारियों ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। उनका कहना है कि यह कानून उनकी पदोन्नति की संभावनाओं को सीमित करता है और 23 मई 2025 के उस निर्णय को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी कर देता है, जिसमें वरिष्ठ पदों पर भारतीय पुलिस सेवा के प्रतिनियुक्ति अधिकारियों की क्रमिक कमी का निर्देश दिया गया था।
केंद्र सरकार ने अपने विस्तृत प्रत्युत्तर हलफनामे में इस अधिनियम का बचाव किया है। सरकार का कहना है कि यह कानून पहले के फैसले को न तो निरस्त करता है और न ही पलटता है, जबकि देश की आंतरिक सुरक्षा संरचना के लिए भारतीय पुलिस सेवा की प्रतिनियुक्ति आवश्यक बनी हुई है।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाओं में वीरता पुरस्कार प्राप्त अधिकारी भी शामिल हैं। प्रमुख याचिकाकर्ता सीआरपीएफ के सहायक कमांडेंट बिभोर कुमार सिंह हैं, जिन्हें शौर्य चक्र मिला है। फरवरी 2022 में बिहार के गया और औरंगाबाद जिलों में एक माओवादी विरोधी अभियान के दौरान उन्होंने दोनों निचले अंग और बाएं हाथ की उंगलियां खो दी थीं।
एक अन्य याचिकाकर्ता हरशपाल सिंह हैं, जिन्हें जम्मू में एक अभियान के लिए कीर्ति चक्र मिला था। अधिकारियों का कहना है कि यह अधिनियम उनके करियर पर एक “कांच की छत” खड़ी करता है, पदोन्नति में ठहराव को बढ़ाता है और कुछ मामलों में पहली पदोन्नति 15 से 16 वर्ष तक टाल देता है। उनका यह भी कहना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 तथा शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान
संसद ने इस विधेयक को अप्रैल 2026 में पारित किया था। राज्यसभा ने इसे 1 अप्रैल और लोकसभा ने 2 अप्रैल को मंजूरी दी। गृह मंत्रालय ने 8 अक्टूबर 2026 को इसे अधिसूचित कर लागू कर दिया। यह अधिनियम पांच केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, यानी सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी के ग्रुप ए अधिकारियों के लिए भर्ती, पदोन्नति, प्रतिनियुक्ति और सेवा शर्तों का एक समान ढांचा बनाता है।
अधिनियम के तहत इंस्पेक्टर जनरल के 50 प्रतिशत पद भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाने हैं। अतिरिक्त महानिदेशक के कम से कम 67 प्रतिशत पद भी प्रतिनियुक्ति के लिए आरक्षित हैं। विशेष महानिदेशक और महानिदेशक के सभी पद केवल प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे।
याचिकाकर्ताओं ने अधिनियम की धारा 3 और 4 को विशेष रूप से चुनौती दी है। उनका कहना है कि ये धाराएं भर्ती और सेवा शर्तों को अदालत के किसी भी निर्णय के बावजूद नियंत्रित करती हैं और केंद्र को अधिसूचना के जरिए अनुसूचियों में संशोधन का अधिकार देती हैं। वे यह भी कहते हैं कि अधिनियम में उप महानिरीक्षक पदों पर सीएपीएफ संवर्ग अधिकारियों के लिए पहले से मौजूद 50 प्रतिशत आरक्षण को बनाए नहीं रखा गया है।
अधिकारियों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह अधिनियम सर्वोच्च न्यायालय के 23 मई 2025 के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए लाया गया था। उस फैसले में संजय प्रकाश बनाम भारत संघ मामले में वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड तक, यानी आईजी रैंक तक, प्रतिनियुक्ति पदों को दो वर्ष के भीतर क्रमिक रूप से घटाने और कैडर समीक्षा करने का निर्देश दिया गया था। यह फैसला पदोन्नति में लगभग दो दशक से जारी ठहराव पर चली आ रही सुनवाई के बाद आया था।
अधिकारियों ने 2025 के निर्देशों के पालन, उच्च प्रशासनिक ग्रेड के पदों को योग्य कार्यकारी संवर्ग अधिकारियों से भरे जाने की घोषणा और समय पर कैडर समीक्षा के साथ पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि तय प्रतिनियुक्ति कोटा का कोई वास्तविक परिचालन आधार नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि इससे उन अधिकारियों के साथ भेदभाव होता है, जिन्होंने अपना पूरा करियर सीमांत सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी कार्य, नक्सल-रोधी अभियानों और आंतरिक सुरक्षा जैसे विशेष क्षेत्रों में बिताया है। उनके अनुसार, इससे मनोबल पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
केंद्र का बचाव
गृह मंत्रालय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग और सीआरपीएफ की ओर से दायर संयुक्त प्रत्युत्तर हलफनामे में केंद्र ने कहा कि 2026 का अधिनियम 23.05.2025 के निर्णय के विरुद्ध अपील करने का प्रयास नहीं है। सरकार के अनुसार, यह एक वैध विधायी कदम है, जो उस कानूनी आधार को बदलता है जिस पर उस निर्णय के निर्देश आधारित थे।
सरकार ने कहा कि संसद को कानून बनाने की क्षमता है और यह अधिनियम किसी ऐसे प्रावधान को फिर से लागू नहीं करता जिसे पहले असंवैधानिक ठहराया गया हो। केंद्र का कहना है कि सीएपीएफ में भारतीय पुलिस सेवा की प्रतिनियुक्ति उनकी भर्ती नियमावली के आरंभ से ही रही है और यह राज्य पुलिस बलों के साथ समन्वय, आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी अभियान, वामपंथी उग्रवाद, सीमा प्रबंधन और खुफिया तंत्र के लिए आवश्यक है।
केंद्र ने भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की क्षमता पर उठाए गए सवालों को भी खारिज किया। उसका कहना है कि ये अधिकारी संबंधित क्षेत्रों में सेवा देते हैं और केंद्र तथा राज्यों के बीच कड़ी का काम करते हैं। सरकार ने यह भी कहा कि सीएपीएफ के वरिष्ठ पदों पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी बहुसंख्यक नहीं हैं।
सरकार के अनुसार 607 स्वीकृत उप महानिरीक्षक पदों में से केवल 47 और 140 स्वीकृत इंस्पेक्टर जनरल पदों में से 64 पद ही भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के पास हैं। केंद्र ने यह भी कहा कि अदालत द्वारा निर्देशित कैडर समीक्षा नए अधिनियम के ढांचे के भीतर जारी है।
पृष्ठभूमि और मौजूदा सुनवाई
सर्वोच्च न्यायालय के मई 2025 के फैसले में वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड तक प्रतिनियुक्ति पदों को दो वर्ष के भीतर क्रमिक रूप से घटाने का निर्देश दिया गया था। केंद्र की पुनर्विचार याचिका अक्टूबर 2025 में खारिज कर दी गई थी। इसके बाद 2025 के फैसले के बाद की गई 46 भारतीय पुलिस सेवा प्रतिनियुक्तियों की भी जांच हुई।
अवमानना याचिकाओं को अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है। एक विशेष पीठ इन मामलों की सुनवाई कर रही है। अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अगली सुनवाई नवंबर 2026 में होनी है।
विवाद का केंद्र सीएपीएफ की परिचालन जरूरतों और प्रत्यक्ष भर्ती अधिकारियों के करियर विकास के बीच संतुलन है। इन बलों की संयुक्त संख्या लगभग दस लाख है और इनका उपयोग सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी कार्य और आंतरिक सुरक्षा में होता है।
इस मामले का नतीजा सीएपीएफ की नेतृत्व संरचना और 2025 के फैसले के व्यावहारिक प्रभाव दोनों को तय करेगा।