सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुग्राम में भारतीय वायु सेना के गोला-बारूद डिपो के आसपास बड़े पैमाने पर हुई अनधिकृत निर्माण गतिविधियों पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने यह सवाल उठाया कि संवेदनशील रक्षा प्रतिष्ठान के चारों ओर बने प्रतिबंधित सुरक्षा क्षेत्र में हजारों ढांचे और कई अवैध कालोनियां कैसे विकसित होने दी गईं।
मामला पुराने गुरुग्राम में स्थित आईएएफ गोला-बारूद डिपो के चारों ओर 900 मीटर के दायरे से जुड़ा है। यह क्षेत्र अपनी रणनीतिक सैन्य स्थिति के कारण लंबे समय से निर्माण और शहरीकरण पर प्रतिबंधों के अधीन रहा है। क्षेत्र से मिली रिपोर्टों के अनुसार, इस दायरे में वर्षों के दौरान आवासीय इमारतें, दुकानें और अन्य प्रतिष्ठान काफी बढ़ गए हैं।
इस सप्ताह की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय अधिकारियों के आचरण पर सवाल उठाए और अनधिकृत विकास में अधिकारियों तथा संबंधित लोगों की मिलीभगत की आशंका भी जताई। अदालत की टिप्पणियां ऐसे समय में आईं जब डिपो के आसपास का प्रतिबंधित क्षेत्र लंबे समय से चल रही कानूनी कार्यवाही के बावजूद घनी आबादी वाला हो चुका है।
रिपोर्टों के अनुसार, प्रतिबंधित दायरे में लगभग 15 अनधिकृत कालोनियां विकसित हो चुकी हैं। कई स्थानों पर बहुमंजिला मकान और व्यावसायिक प्रतिष्ठान डिपो की सीमा-दीवार के बेहद करीब बने हुए हैं, जिससे नागरिक ढांचों और रक्षा प्रतिष्ठान के बीच बहुत कम दूरी बची है।
पिछले कुछ वर्षों में निर्माण का पैमाना काफी बढ़ा है। इस साल की शुरुआत में नगर निगम गुरुग्राम की एक आंतरिक रिपोर्ट में कहा गया था कि पिछले पांच वर्षों में ही 900 मीटर के बफर क्षेत्र के भीतर 5,000 से अधिक अवैध ढांचे खड़े हो गए। इनमें पेइंग-गेस्ट आवास, व्यावसायिक प्रतिष्ठान, कार्यालय, क्लाउड किचन और अन्य अनधिकृत सुविधाएं शामिल बताई गई हैं।
गोला-बारूद डिपो के आसपास निर्माण को लेकर विवाद नया नहीं है। यह सुविधा 1947 की है, जब आसपास का क्षेत्र काफी हद तक अविकसित था। गुरुग्राम के तेज शहरी विस्तार के साथ आवासीय विकास धीरे-धीरे इस प्रतिष्ठान के और करीब पहुंचता गया। अदालतों और सरकारी प्राधिकरणों ने वर्षों से इस मुद्दे पर काम किया है, जिसमें प्रतिबंधित क्षेत्र की सीमा और मौजूदा ढांचों के उपचार से जुड़े विवाद भी शामिल रहे हैं।
डिपो से जुड़ी भूमि पर 2010 के एक फैसले में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस गोला-बारूद डिपो को एक रणनीतिक रक्षा प्रतिष्ठान बताया था और जोर दिया था कि रक्षा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विचारों से समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत ने वैधानिक और कार्यकारी प्राधिकरणों को प्रतिबंधित क्षेत्र में अवैध निर्माण फैलने देने के लिए भी आलोचना का सामना कराया था।
सर्वोच्च न्यायालय भी इस क्षेत्र से जुड़ी मुकदमेबाजी को वर्षों से देखता रहा है। दिसंबर 2024 के एक फैसले में, उसने 900 मीटर की सीमा के भीतर नए निर्माण और कथित अवैध इमारतों के ध्वस्तीकरण से जुड़ी कुछ अपीलों को अलग कर दिया था, ताकि उन मामलों पर स्वतंत्र रूप से विचार किया जा सके।
ताजा टिप्पणियों ने एक बार फिर गुरुग्राम की सबसे संवेदनशील रक्षा सुविधाओं में से एक के आसपास हुई अनधिकृत शहरीकरण की व्यापकता और गोला-बारूद डिपो के चारों ओर सुरक्षा घेरा बनाए रखने के लिए प्रतिबंधों को लागू करने में नागरिक तथा राज्य अधिकारियों की भूमिका की ओर ध्यान खींचा है।