नई दिल्ली, 6 अक्टूबर 2026: थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने निदेशालय जनरल सूचना प्रणाली (डीजीआईएस) में मिशन ऑटोनॉमी लैब और सेंसर-शूटर इंटीग्रेशन लैब का उद्घाटन किया। यह कदम भारतीय सेना को प्रौद्योगिकी-समर्थ और भविष्य के लिए तैयार बल के रूप में विकसित करने की दिशा में एक और पहल माना जा रहा है।
नवस्थापित इन प्रयोगशालाओं का उद्देश्य सेना की इस क्षमता को मजबूत करना है कि वह प्रयोगशाला में विकसित होती नई प्रौद्योगिकियों का परीक्षण, समेकन और उन्हें जल्दी से कार्यक्षेत्र तक पहुंचा सके। इन सुविधाओं का ध्यान स्वायत्तता, डेटा-केंद्रित अभियानों और सेंसर तथा हथियार प्रणालियों के बीच बेहतर एकीकरण पर रहेगा।
मिशन ऑटोनॉमी लैब सैन्य उपयोग के लिए स्वायत्त प्रौद्योगिकियों के परीक्षण और समेकन में मदद करेगी। आधुनिक युद्ध में ऐसी क्षमताएं लगातार अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही हैं, क्योंकि सशस्त्र बल मानवरहित प्लेटफॉर्म, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत सेंसर और स्वचालित प्रणालियों को युद्धक्षेत्र अभियानों में शामिल कर रहे हैं।
सेंसर-शूटर इंटीग्रेशन लैब युद्धक्षेत्र के सेंसरों, कमान-एवं-नियंत्रण नेटवर्क और हथियार प्लेटफॉर्मों के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर केंद्रित होगी। प्रभावी सेंसर-से-शूटर एकीकरण से किसी लक्ष्य का पता लगने, सूचना के प्रसंस्करण और साझा करने, निर्णय लेने तथा उपयुक्त हथियार प्रणाली से उसे भेदने के बीच का समय काफी कम किया जा सकता है।
भारतीय सेना के अनुसार, ये प्रयोगशालाएं उभरती प्रौद्योगिकियों को युद्धक्षेत्र-तैयार क्षमताओं में बदलने में मदद करेंगी। इससे नई प्रणालियों को तेजी से अपनाने में सुविधा होगी और कमांडरों तथा सैनिकों को अधिक परिचालन लाभ मिलेगा।
उद्घाटन के दौरान जनरल सेठ ने विजय की परिकल्पना को दोहराया और नवाचार, समेकन तथा आत्मनिर्भरता को एक चुस्त, प्रौद्योगिकी-समर्थ और भविष्य के लिए तैयार भारतीय सेना के निर्माण में प्रमुख तत्व बताया।
डीजीआईएस में इन दोनों प्रयोगशालाओं की स्थापना नेटवर्क-केंद्रित युद्ध, स्वायत्त प्रणालियों और डेटा-आधारित अभियानों पर सेना के बढ़ते ध्यान को भी दर्शाती है। यह पहल जटिल और प्रौद्योगिकी-प्रधान युद्धक्षेत्रों की चुनौतियों के अनुरूप तैयारी को और मजबूत करने की दिशा में है।
इस पहल का व्यापक उद्देश्य तकनीकी विकास से लेकर उसके परिचालन उपयोग तक की यात्रा को छोटा करना है। इसके तहत आशाजनक समाधानों का परीक्षण, समेकन और उन्हें युद्धक्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुसार ढालने पर जोर रहेगा, ताकि प्रौद्योगिकी को क्षमता और क्षमता को निर्णायक युद्ध लाभ में बदला जा सके।