नई दिल्ली, 24 अक्टूबर 2026: साहस, जिजीविषा और दृढ़ संकल्प की एक प्रेरक कहानी में भारतीय सेना की 16 सिख लाइट इन्फैंट्री के हवलदार गुरदेव सिंह ने जानलेवा बारूदी सुरंग विस्फोट की चोट से उबरकर पदक जीतने वाले पैरा-रोइंग खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाई है। उनकी यह यात्रा दिखाती है कि एक सैनिक की भावना असाधारण विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं टूटती।
भारतीय सेना में 2011 से सेवा दे रहे हवलदार गुरदेव सिंह 2024 में जम्मू-कश्मीर के उरी में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इस विस्फोट में उनका बायां पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा, जिससे उनके जीवन और सैन्य करियर में अचानक और गहरा बदलाव आ गया।
लेकिन चोट को अपने भविष्य की परिभाषा बनने देने के बजाय उन्होंने खेल के माध्यम से जीवन को फिर से संवारने का फैसला किया। कठिन परिस्थितियों के प्रति उनका नजरिया एक प्रेरक विचार में झलकता है, जो उनका मार्गदर्शक बन गया: “यदि मैं पैरों से नहीं चल सकता, तो मैं हाथों से मार्च कर सकता हूँ।”
इसी दृढ़ता के साथ गुरदेव सिंह ने रोइंग को चुना, जो ऊपरी शरीर की शक्ति, सहनशक्ति, समन्वय और मानसिक अनुशासन की मांग करने वाला बेहद कठिन खेल है।
2025 में वे पुणे स्थित आर्मी रोइंग नोड से जुड़े, जहां उन्होंने युद्धक्षेत्र की अपनी दृढ़ता को प्रतिस्पर्धी खेल प्रदर्शन में बदलना शुरू किया। कठोर प्रशिक्षण, लगन और समर्पण के दम पर उन्होंने पैरा-रोइंग स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए आवश्यक कौशल विकसित किए।
उनके प्रयासों का जल्द ही उल्लेखनीय परिणाम सामने आया। हवलदार गुरदेव सिंह ने कई राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में पदक जीते, जिनमें 2026 पैरा रोइंग चैम्पियनशिप में एक प्रतिष्ठित रजत पदक भी शामिल है।
गंभीर युद्ध-संबंधी चोट से उबरते हुए एक सफल पैरा-रोइंग खिलाड़ी बनने तक का उनका सफर भारतीय सेना की उस जिजीविषा और लड़ाकू भावना को उजागर करता है, जो उसकी पहचान है।
सेना ने उनकी इस उल्लेखनीय यात्रा को अपने #StoriesOfGrit अभियान के तहत साझा किया है। इसके माध्यम से उनकी उस क्षमता को सराहा गया है, जिसमें उन्होंने शारीरिक सीमाओं को पार कर जीवन बदल देने वाली चोट के बावजूद उत्कृष्टता हासिल की।
हवलदार गुरदेव सिंह की यह कहानी याद दिलाती है कि साहस केवल रणभूमि तक सीमित नहीं है। जीवन को फिर से संवारने और खेल में सफलता हासिल करने का उनका संकल्प देशभर के साथियों, दिव्यांगजनों और युवाओं के लिए प्रेरणा बना हुआ है।
उरी में विनाशकारी बारूदी सुरंग विस्फोट से बचकर राष्ट्रीय स्तर के पैरा-रोइंग पदक विजेता के रूप में मंच तक पहुंचने वाले हवलदार गुरदेव सिंह ने साबित किया है कि चोट किसी सैनिक का रास्ता बदल सकती है, लेकिन सफलता पाने का उसका संकल्प कम नहीं कर सकती।