सशस्त्र बलों के अनुशासन और संचालन संबंधी आवश्यकताओं को मजबूत करने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय वायु सेना के कर्मियों को अपनी इच्छा से सैन्य सेवा छोड़कर नागरिक नौकरी अपनाने का “बिना शर्त अधिकार” नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि समय से पहले सेवा से मुक्ति से जुड़े वायु सेना के नियमों का कड़ाई से पालन अनिवार्य है और इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता, भले ही किसी एयरमैन का चयन सरकारी पद के लिए हो गया हो।
न्यायमूर्ति उज्जल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने भारतीय वायु सेना के कॉर्पोरल नखत सिंह की अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने दोहराया कि भारतीय वायु सेना के सदस्य एक अनुशासित सैन्य बल का हिस्सा हैं और सेवा नियमों का पालन करना उनके लिए बाध्यकारी है, ताकि परिचालन तत्परता और संगठनात्मक स्थिरता बनी रहे।
मामला तब उठा जब भारतीय वायु सेना में सात वर्ष की सेवा पूरी कर चुके कॉर्पोरल नखत सिंह का चयन राजस्थान लोक सेवा आयोग के माध्यम से सहायक प्रोफेसर (हिंदी) पद के लिए हुआ। चयन के बाद उन्होंने नई नियुक्ति जॉइन करने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र और सेवा से मुक्ति की मांग की।
लेकिन अक्टूबर 2022 में एयर ऑफिसर कमांडिंग ने उनका अनुरोध यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उन्होंने नागरिक पद के लिए आवेदन करने से पहले आवश्यक पूर्व अनुमति नहीं ली थी, जैसा कि 2017 के भारतीय वायु सेना आदेश में अनिवार्य किया गया है। वायु सेना के नियमों के अनुसार, नागरिक रोजगार के लिए आवेदन करने के इच्छुक कर्मियों को आवेदन जमा करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी लेनी होती है।
सशस्त्र बल अधिकरण और दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा वायु सेना के फैसले को बरकरार रखने के बाद नखत सिंह ने अपने अनुरोध की अस्वीकृति को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अपील खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिक पद के लिए आवेदन करने से पहले पूर्व अनुमति लेना केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि समय से पहले सैन्य सेवा से मुक्ति को नियंत्रित करने वाला एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है।
फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर ने कहा कि नागरिक पद के लिए आवेदन करने से पहले पूर्व अनुमति लेना और उसके बाद सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करना ऐसे सामान्य प्रक्रियागत नियम नहीं हैं, जिन्हें एयरमैन अपनी इच्छा से नजरअंदाज कर दे।
अदालत ने यह भी कहा कि ये प्रावधान भारतीय वायु सेना कर्मियों की समय से पहले सेवा से मुक्ति को नियंत्रित करने और यह सुनिश्चित करने से सीधे जुड़े हैं कि बल की मानव संसाधन योजना और संचालन संबंधी प्रतिबद्धताएं प्रभावित न हों।
सैन्य सेवा की विशेष प्रकृति पर जोर देते हुए पीठ ने कहा कि वायु सेना के कर्मी एक अनुशासित सशस्त्र बल का हिस्सा हैं, जहां इस्तीफे या सेवा से मुक्ति से जुड़े व्यक्तिगत निर्णयों को नागरिक रोजगार की तरह नहीं देखा जा सकता।
अदालत ने कहा, “यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि एयरमैन भारतीय वायु सेना के सदस्य हैं, जो एक अनुशासित बल है।” कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि सैन्य सेवा के दायित्व सामान्य सरकारी कर्मचारियों की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक होते हैं।
फैसले में भारतीय वायु सेना की परिचालन तैयारी बनाए रखने के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। यदि कर्मियों को निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किए बिना सेवा छोड़ने की अनुमति दी जाए, तो इकाई की संख्या, परिचालन क्षमता और दीर्घकालिक मानव संसाधन प्रबंधन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, विशेषकर ऐसे बल में जो राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाता है।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 2019 के एक पहले निर्णय की कानूनी स्थिति को भी दोहराता है, जिसमें एक एयरमैन द्वारा अनिवार्य सेवा शर्तें पूरी किए बिना बैंकिंग पद के लिए आवेदन करने के मामले में भी वायु सेना के नियमों को बरकरार रखा गया था। इस सिद्धांत की फिर से पुष्टि करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सशस्त्र बलों के सदस्यों पर लागू सेवा नियमों की बाध्यकारी प्रकृति को लेकर और स्पष्टता दी है।
इस निर्णय का व्यापक असर भारतीय वायु सेना में सेवा दे रहे उन कर्मियों पर पड़ने की संभावना है जो वर्दी में रहते हुए नागरिक सरकारी सेवाओं में जाना चाहते हैं। हालांकि फैसला वायु सेना के कर्मियों को नागरिक रोजगार मांगने से रोकता नहीं है, लेकिन यह साफ करता है कि उन्हें पूर्व अनुमति, अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कराने और सेवा से मुक्ति से जुड़े नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।
यह निर्णय इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि सैन्य सेवा एक अलग कानूनी और प्रशासनिक ढांचे से संचालित होती है, जहां व्यक्तिगत करियर आकांक्षाओं और सशस्त्र बलों की परिचालन जरूरतों के बीच संतुलन जरूरी है। भारतीय वायु सेना के नियमों को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि अनुशासन, संगठनात्मक अखंडता और युद्ध तत्परता बनाए रखना राष्ट्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले पेशेवर सैन्य बल के लिए सर्वोपरि है।