नई दिल्ली, 9 अगस्त 2026 — भारतीय वायु सेना के एक कार्यरत विंग कमांडर पर, जिन्हें इस वर्ष पहले कथित रूप से गोपनीय रक्षा जानकारी लीक करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, अब एक सहयोगी के मोबाइल फोन में डेटा चुराने वाला सॉफ्टवेयर स्थापित करने का आरोप भी लगा है। यह आरोप कथित पाकिस्तानी खुफिया-लिंक्ड जासूसी अभियान से जुड़ा बताया जा रहा है। 44 वर्षीय अधिकारी तिहाड़ जेल में न्यायिक हिरासत में हैं और उनके खिलाफ आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है।
दिल्ली पुलिस और भारतीय वायु सेना के सूत्रों के अनुसार, पश्चिमी मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण फील्ड इकाई में तैनात यह अधिकारी एक महिला के जरिए सोशल मीडिया पर रचे गए हनी ट्रैप का शिकार हुआ। बताया गया है कि महिला पाकिस्तानी संचालकों की ओर से काम कर रही थी। उसका भरोसा जीतने के बाद उसने कथित तौर पर न केवल संवेदनशील सैन्य दस्तावेज और परिचालन विवरण साझा करने के लिए कहा, बल्कि एक अन्य अधिकारी के उपकरण में जासूसी सॉफ्टवेयर लगाने के लिए भी प्रेरित किया, ताकि गोपनीय जानकारी तक पहुंच बढ़ाई जा सके।
जासूसी सॉफ्टवेयर का आरोप कैसे सामने आया
वरिष्ठ दिल्ली पुलिस सूत्रों के मुताबिक, 2026 की शुरुआत में सोशल मीडिया मंच पर इस विंग कमांडर से संपर्क किया गया था, जब वह निजी कठिनाइयों से गुजर रहे थे। जो बातचीत सामान्य संदेशों से शुरू हुई, वह नियमित वीडियो कॉल और एन्क्रिप्टेड संदेश अनुप्रयोगों पर संवाद में बदल गई। भरोसा कायम होने के बाद महिला ने उससे तस्वीरें, वीडियो और सैनिकों की तैनाती, सैन्य इकाइयों की आवाजाही तथा सीमा पर चल रही रणनीतिक गतिविधियों का ब्योरा मांगना शुरू किया।
जांचकर्ताओं का आरोप है कि अधिकारी ने “महत्वपूर्ण दस्तावेज और आंकड़े” डिजिटल माध्यमों से भेजे। इसके बाद कथित हैंडलर ने उसे एक सहयोगी के मोबाइल फोन में एक विशेष अनुप्रयोग स्थापित करने का निर्देश दिया। पुलिस के अनुसार, यह अनुप्रयोग लक्षित जासूसी सॉफ्टवेयर या दूरस्थ पहुंच वाला दुर्भावनापूर्ण प्रोग्राम था, जिसे उपकरण का डेटा चुराने, वास्तविक समय की लोकेशन ट्रैक करने और संचार को बाधित करने के लिए तैयार किया गया था। इसका उद्देश्य दूसरे अधिकारी के फोन में मौजूद जानकारी पर बाहरी संचालकों की पकड़ बढ़ाना बताया गया है।
इस सॉफ्टवेयर की तकनीकी प्रकृति और यदि कोई डेटा निकाला गया हो तो उसकी मात्रा, अभी भी फोरेंसिक जांच के दायरे में है। एजेंसियां यह भी परख रही हैं कि क्या यह दुर्भावनापूर्ण प्रोग्राम सहयोगी के फोन में सफलतापूर्वक घुस गया था और इससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर क्या असर पड़ सकता था।
मामले की समयरेखा
दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने जनवरी 2026 में इलेक्ट्रॉनिक निगरानी शुरू की, जब पाकिस्तानी खुफिया संचालकों से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय फोन नंबर से एक भारतीय मोबाइल नंबर पर बार-बार एन्क्रिप्टेड संचार सामने आया, जिसे बाद में विंग कमांडर का बताया गया। इसके बाद भारतीय वायु सेना की प्रतिरोधी खुफिया इकाइयों ने अधिकारी पर भौतिक और डिजिटल निगरानी रखी।
अगले कुछ महीनों में पुख्ता साक्ष्य जुटाए गए। 30 मई 2026 को, या कुछ विवरणों के अनुसार 31 मई की रात, भारतीय वायु सेना के अधिकारियों ने औपचारिक शिकायत दर्ज कर अधिकारी को दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा के हवाले कर दिया। पहले उन्हें पुलिस हिरासत में रखा गया, फिर जून में तिहाड़ जेल में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। 30 जुलाई 2026 को सक्षम अदालत, जिसे कुछ रिपोर्टों में साकेत अदालत बताया गया है, के समक्ष विस्तृत आरोपपत्र दाखिल किया गया। मामला फिलहाल विचाराधीन है।
आधिकारिक प्रतिक्रियाएं
दिल्ली पुलिस के एक बयान में कहा गया, “भारतीय वायु सेना अधिकारियों की शिकायत के आधार पर एक कार्यरत वायुसेना अधिकारी को 30 मई 2026 को पाकिस्तानी खुफिया संचालक द्वारा हनी ट्रैप किए जाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जांच के बाद 30 जुलाई 2026 को सक्षम अदालत के समक्ष आरोपपत्र दाखिल किया गया और मामला विचाराधीन है।”
भारतीय वायु सेना के एक प्रवक्ता ने कहा कि अधिकारी “सक्रिय निगरानी में था और उसे उपयुक्त कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सौंप दिया गया,” तथा जोड़ा कि समय रहते उठाए गए कदमों से अधिकारियों ने लीक को नियंत्रित कर लिया। बल ने सुरक्षा उल्लंघन और जासूसी के मामलों में शून्य सहनशीलता नीति दोहराई है।
पुलिस सूत्रों ने इस घटना को एक बड़े जासूसी नेटवर्क का हिस्सा बताया है, जिसका उद्देश्य रणनीतिक सैन्य खुफिया जानकारी जुटाना था। वे संचार के डिजिटल निशानों की जांच कर रहे हैं, संभावित विदेश स्थित संचालकों की पहचान कर रहे हैं, लीक हुई जानकारी के दायरे का आकलन कर रहे हैं और यह भी देख रहे हैं कि क्या विंग कमांडर से संपर्क करने वाली महिला ने भारतीय वायु सेना के अन्य कर्मियों को भी निशाना बनाया था।
हनी ट्रैप अभियानों का व्यापक पैटर्न
यह मामला कथित पाकिस्तानी खुफिया अभियानों की उस दोहराई जाने वाली शैली से मेल खाता है, जिसमें सोशल मीडिया प्रोफाइल, भावनात्मक हेरफेर और दुर्भावनापूर्ण सॉफ्टवेयर के जरिए भारतीय रक्षा कर्मियों को निशाना बनाया जाता है। इसी तरह की एक घटना फरवरी 2018 में सामने आई थी, जब दिल्ली पुलिस ने एक भारतीय वायु सेना ग्रुप कैप्टन को फर्जी फेसबुक प्रोफाइल के जरिए हनी ट्रैप किए जाने के बाद गिरफ्तार किया था और उन पर रक्षा अंतरिक्ष तथा साइबर एजेंसियों से जुड़े गोपनीय दस्तावेज साझा करने का आरोप लगा था।
सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि तैनाती, आवाजाही और आंतरिक संचार से जुड़ी अधूरी जानकारी भी विदेशी खुफिया सेवाओं के लिए बेहद मूल्यवान हो सकती है। मौजूदा मामले में जांचकर्ता यह परख रहे हैं कि कथित रूप से साझा की गई सामग्री, या जासूसी सॉफ्टवेयर के जरिए संभावित रूप से हासिल किया गया कोई डेटा, क्या परिचालन सुरक्षा को प्रभावित कर सकता था या शत्रुतापूर्ण गतिविधि को बढ़ावा दे सकता था।
वर्तमान स्थिति
विंग कमांडर की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। वह न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल में बंद हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फोरेंसिक जांच, कथित जासूसी सॉफ्टवेयर स्थापना का पूरा दायरा और किसी व्यापक नेटवर्क की संभावना की जांच दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा, भारतीय वायु सेना की खुफिया इकाइयों और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जारी है।
भारतीय वायु सेना ने जोर देकर कहा है कि अधिकारी की गतिविधियों का पता आंतरिक निगरानी के जरिए लगा, जिससे बड़ा नुकसान होने से पहले ही स्थिति नियंत्रित कर ली गई। जैसे-जैसे मामला अदालत में आगे बढ़ेगा, गोपनीय जानकारी की सटीक प्रकृति और दुर्भावनापूर्ण सॉफ्टवेयर के तकनीकी आकलन से जुड़े और विवरण केवल औपचारिक कानूनी प्रक्रिया में ही सामने आने की उम्मीद है।
यह रिपोर्ट दिल्ली पुलिस और भारतीय वायु सेना के आधिकारिक बयानों तथा वरिष्ठ पुलिस सूत्रों द्वारा कई राष्ट्रीय मीडिया संगठनों को दिए गए समान विवरणों पर आधारित है।