जोधपुर में भारतीय सेना की सैन्य खुफिया इकाई और जोधपुर पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में एक 26 वर्षीय व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया, जो आर्मी इंटेलिजेंस में कैप्टन बनकर एक रेस्टोरेंट में पहुंचा था और पूरी सेना अधिकारी वर्दी पहने हुए था। पुलिस और सेना सूत्रों के अनुसार, आरोपी की पहचान सागर गुलेरिया के रूप में हुई है। वह पंजाब के जालंधर का भगोड़ा पूर्व सेना लिपिक है और आरोप है कि वह आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड के जरिए भारी रियायती ऋण दिलाने का झांसा देकर सेवारत जवानों और अन्य लोगों से करोड़ों रुपये की ठगी कर रहा था।
गिरफ्तारी से पहले सैन्य खुफिया इकाई को यह विशेष सूचना मिली थी कि कैप्टन की वर्दी पहने एक व्यक्ति कई दिनों से सेना क्षेत्र और रतनाडा इलाके में घूम रहा है और संभावित निशाने तलाश रहा है। सूचना पर जोधपुर पुलिस आयुक्त अंशुमान भोमिया ने कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद जोधपुर पूर्व जिला विशेष टीम के उप निरीक्षक खेत सिंह के नेतृत्व में, अतिरिक्त उपायुक्त पुलिस पूर्व नरेंद्र सिंह देओरा और उपायुक्त पुलिस मनीष चौधरी की निगरानी में कार्रवाई की गई। टीम ने रतनाडा स्थित सुख सागर रेस्टोरेंट से गुलेरिया को रंगे हाथों वर्दी में पकड़ लिया। उसके पास से दक्षिणी कमान खुफिया बटालियन का एक फर्जी पहचान पत्र, सेना की वर्दी और मोबाइल फोन में मौजूद डिजिटल सामग्री बरामद की गई, जिसे पुलिस ने आपत्तिजनक साक्ष्य बताया है।
भगोड़े लिपिक से फर्जी अधिकारी तक
प्रारंभिक पूछताछ और सत्यापन में सामने आया कि सागर गुलेरिया, जो सुरेश कुमार का पुत्र है और पंजाब के जालंधर के उजाला नगर का निवासी है, पहले भारतीय सेना में लिपिक के पद पर कार्यरत था। वह पश्चिम बंगाल के पानागढ़ सेना छावनी में 50वीं लाइट एयर डिफेंस रेजिमेंट के साथ तैनात था। वह लगभग 25 अगस्त 2024 को अपनी इकाई से फरार हो गया था और बाद में उसे भगोड़ा/अनुपस्थित घोषित कर दिया गया। अपने लिपिकीय कार्यकाल के दौरान उसे सेना के कागजी काम, आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड से जुड़ी प्रक्रियाओं, वर्दी नियमों और अधिकारियों के व्यवहार की जानकारी मिल गई थी, जिसका उसने कथित रूप से दुरुपयोग किया।
पुलिस के अनुसार, उसका आपराधिक इतिहास भी इसी तरह की ठगी से जुड़ा रहा है। इससे पहले उसे हरियाणा के पंचकूला में आर्थिक अपराध शाखा ने एक मामले में गिरफ्तार किया था, जिसमें एक सेना नायक और उनकी पत्नी से 17.5 लाख रुपये की ठगी की गई थी। वह जमानत तुड़वाकर फरार हो गया और अपनी गतिविधियां जारी रखता रहा। पुलिस का कहना है कि उससे जुड़े मामले गुजरात, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में दर्ज हैं।
एजीआईएफ के नाम पर फर्जी ऋण का खेल
जांचकर्ताओं के अनुसार, गुलेरिया की मुख्य कार्यप्रणाली यह थी कि वह सैन्य खुफिया से जुड़े कैप्टन के रूप में वर्दी पहनकर सेवारत सेना कर्मियों से संपर्क करता था। वह आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड के माध्यम से व्यक्तिगत या आवास ऋण पर बड़ी सब्सिडी दिलाने का दावा करता था। ऋण स्वीकृत होकर पीड़ित के खाते में आने के बाद वह जवान को रकम अपने या अपने सहयोगियों के खातों में भेजने के लिए कहता था, यह कहकर कि सब्सिडी की प्रक्रिया के लिए ऐसा करना जरूरी है। वह यह भरोसा दिलाता था कि रियायती राशि बाद में लौटा दी जाएगी। कई मामलों में पीड़ितों के खाते बाद में अवरुद्ध हो गए या संपर्क टूट गया।
पुलिस और सेना सूत्रों का कहना है कि इस पूरे मामले में रकम करोड़ों रुपये तक पहुंचती है। प्रारंभिक निष्कर्षों में कुछ उदाहरण भी सामने आए हैं, जिनमें गुजरात के भुज में तैनात एक सेना कर्मी से 15.5 लाख रुपये की कथित ठगी, पंचकूला का 17.5 लाख रुपये वाला मामला, तथा पंजाब के एसएएस नगर, पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी और अन्य स्थानों से जुड़े मामले शामिल हैं।
जांचकर्ताओं को यह भी पता चला है कि गुलेरिया महिलाओं को भी सेना अधिकारी बनकर निशाना बनाता था। उसके मोबाइल फोन की डिजिटल जांच में कई ऐसे पीड़ितों से जुड़ी सामग्री मिलने की बात कही गई है। पुलिस अब तक उसे कम से कम सात ठगी शिकायतों और गुजरात, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल में दर्ज आठ ऑनलाइन साइबर अपराध शिकायतों से जोड़ चुकी है। बैंक खातों और मोबाइल नंबरों के जरिए हुए लाखों रुपये के लेनदेन की जांच की जा रही है।
अतिरिक्त उपायुक्त पुलिस नरेंद्र सिंह देओरा ने पुष्टि की कि पूछताछ के दौरान गुलेरिया ने शुरुआत में खुद को “कैप्टन सागर गुलेरिया” बताया था। पूछताछ में सैन्य खुफिया कर्मी भी शामिल रहे। संभावित राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के बारे में पूछे जाने पर देओरा ने कहा कि मामला अभी जांच के अधीन है। पुलिस डिजिटल साक्ष्य, बैंक लेनदेन, दस्तावेजों और सहयोगियों के संभावित नेटवर्क की जांच कर रही है।
रक्षा कर्मियों के लिए चिंता का विषय
यह मामला एक बार फिर उस कमजोर कड़ी को उजागर करता है, जिसमें सेवारत सैनिक कई बार ऐसे लोगों पर भरोसा कर लेते हैं जो सैन्य तंत्र के भीतर किसी पद या अधिकार का दावा करते हैं। सेना ग्रुप इंश्योरेंस फंड की सुविधाओं या अन्य कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर ठगी करने वाले तत्व देश के विभिन्न हिस्सों में पहले भी सामने आए हैं। इस मामले में आरोपी की वास्तविक पूर्व सेवा और आंतरिक प्रक्रियाओं की जानकारी ने उसके झांसे को और विश्वसनीय बना दिया।
सेना की सैन्य खुफिया इकाई की समय रहते मिली सूचना और जोधपुर पुलिस की त्वरित संयुक्त कार्रवाई से एक संवेदनशील सैन्य क्षेत्र में आगे की गतिविधि रुक गई। अधिकारियों ने कहा कि सैन्य रैंकों, विशेषकर खुफिया अधिकारियों का रूप धारण करना, न केवल कर्मियों को आर्थिक नुकसान पहुंचाता है बल्कि वर्दी पहनकर रक्षा प्रतिष्ठानों के पास अनधिकृत व्यक्तियों की मौजूदगी से सुरक्षा संबंधी चिंता भी पैदा करता है।
आगे की जांच में सभी पीड़ितों की पहचान, जुड़े हुए बैंक खातों को फ्रीज करने और ठगी की पूरी सीमा तय करने का काम किया जा रहा है। पुलिस ने सेना कर्मियों और उन नागरिकों से भी सामने आने की अपील की है, जिन्हें किसी ने खुफिया अधिकारी बनकर ऋण या सब्सिडी का प्रस्ताव दिया हो।
आरोपी फिलहाल पुलिस हिरासत में है और उससे नागरिक पुलिस तथा सैन्य खुफिया दोनों पूछताछ कर रहे हैं। जैसे-जैसे और पीड़ित सामने आएंगे तथा डिजिटल फॉरेंसिक जांच आगे बढ़ेगी, अतिरिक्त मामले दर्ज होने की संभावना है।
यह घटना रक्षा कर्मियों के लिए इस बात की याद दिलाती है कि जो भी व्यक्ति स्वयं को आधिकारिक सेना प्रतिनिधि बताए, उसकी पहचान की पुष्टि अवश्य की जाए, विशेषकर जब मामला वित्तीय लेनदेन या ऋण सुविधा से जुड़ा हो। कल्याण संबंधी सभी पूछताछ केवल अपनी इकाइयों या आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड के अधिकृत माध्यमों से ही की जानी चाहिए।