उत्तराखंड के जोशीमठ क्षेत्र में तमक नाला के पास 12 दिनों तक चले लगातार खोज अभियान के बाद भारतीय सेना ने हवलदार पंकज का शव बरामद कर लिया। इस खोज अभियान के साथ लगभग दो सप्ताह से परिवार की प्रतीक्षा भी समाप्त हुई।
हवलदार पंकज, जो सीमा सड़क संगठन की 123 सड़क निर्माण कंपनी में चालक के रूप में कार्यरत थे, भारी वर्षा के बाद निति घाटी क्षेत्र में तमक नाला के पास पानी और मलबे की तेज धारा में बह गए थे।
रक्षा मंत्रालय के देहरादून क्षेत्रीय जनसंपर्क अधिकारी के अनुसार, पंकज अपने साथियों को बचाने की कोशिश करते समय बह गए थे। घटना के बाद भारतीय सेना की टीमों ने उन्हें खोजने के लिए बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता एवं आपदा राहत अभियान शुरू किया।
खोज अभियान बेहद कठिन परिस्थितियों में 12 दिन तक चलता रहा। बचावकर्मियों को तेज जलधारा, अस्थिर भूभाग, कठिन ऊंचाई, मलबे और खराब मौसम का सामना करना पड़ा।
हवलदार पंकज का शव आखिरकार 22 अगस्त को बरामद किया गया। इसके साथ ही यह गहन खोज अभियान समाप्त हुआ और उनके परिवार तथा साथियों को आवश्यक संतोष मिला।
घटना का कारण बनी भारी वर्षा से क्षेत्र में जलस्तर अचानक बढ़ गया था और तमक नाला पर सीमा सड़क संगठन द्वारा बनाई गई बैली पुल भी बह गई थी। यह पुल रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ज्योतिर्मठ-मलारी/निति मोटर मार्ग का हिस्सा था, जो क्षेत्र के अग्रिम इलाकों तक संपर्क प्रदान करता है।
इस घटना के बाद कई एजेंसियों ने मिलकर खोज अभियान चलाया। भारतीय सेना, सीमा सड़क संगठन, गढ़वाल राइफल्स, जिला प्रशासन, पुलिस, राज्य आपदा प्रतिवादन बल और राष्ट्रीय आपदा प्रतिवादन बल की टीमों को तैनात किया गया।
बचाव दलों ने तमक नाला के आसपास मलबे वाले क्षेत्रों, जलधाराओं, नदी किनारों और अन्य स्थानों पर व्यवस्थित ढंग से खोज की, ताकि लापता व्यक्ति का पता लगाया जा सके।
भूभाग और मौसम से जुड़े जोखिमों के बावजूद अभियान जारी रहा। सेना की मानवीय सहायता एवं आपदा राहत टीमों ने पूरे समय प्रयास बनाए रखे, जबकि कठिन हालात ने कई क्षेत्रों तक पहुंच को और भी जटिल बना दिया।
देहरादून क्षेत्रीय जनसंपर्क अधिकारी ने इस बरामदगी को पंकज के साथियों के उस वादे की पूर्ति बताया, जिसमें उन्हें घर वापस लाने की बात कही गई थी। यह संदेश कठिन परिस्थितियों में अपने कर्मियों को अकेला न छोड़ने की सेना की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है।
हवलदार पंकज की बरामदगी ने एक कठिन खोज अभियान का अंत किया और उत्तराखंड के पहाड़ी भूभाग में कार्यरत सेना तथा सीमा सड़क संगठन के कर्मियों के सामने आने वाली चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को भी सामने रखा।
123 सड़क निर्माण कंपनी में उनकी सेवा उन्हें उस कर्मियों की पंक्ति में रखती थी, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में सड़क ढांचे और संपर्क व्यवस्था को सहारा देते हैं। यह घटना ऐसे क्षेत्रों में अवसंरचना बनाए रखने और विकसित करने से जुड़े जोखिमों को भी उजागर करती है, जहां चरम मौसम और जलस्तर में अचानक बदलाव आम चुनौती बन सकते हैं।
12 दिनों तक चला यह अभियान दूरस्थ और कठिन भूभाग में आपात स्थितियों के दौरान सेना और नागरिक आपदा-प्रतिक्रिया एजेंसियों के समन्वित प्रयासों का भी उदाहरण बना। 22 अगस्त को हवलदार पंकज का शव मिलने के साथ उनके परिवार को आखिरकार संतोष मिला, जबकि उनके साथियों का प्रयास इस भावना को पुष्ट करता है कि हर सैनिक महत्वपूर्ण है और किसी भी साथी को पीछे नहीं छोड़ा जाता।