कोलकाता में 36 वर्ष बाद भारतीय सेना के एक नायक की पत्नी ने पुलिस से औपचारिक प्राथमिकी दर्ज करने और समापन रिपोर्ट देने की मांग की है, ताकि उनके पति पर लगी “भगोड़ा” की छाप पर पुनर्विचार हो सके और वह परिवार पेंशन तथा संबंधित लाभों का दावा कर सकें।
सरसुना की 61 वर्षीय आरोकिया मैरी राजन ने बताया कि उनके पति एडविन राजन सेना सेवा कोर में नायक और लिपिक के रूप में कार्यरत थे और हिमाचल प्रदेश के डलहौजी छावनी में तैनात थे। 18 जनवरी 1990 को छुट्टी पूरी करने के बाद वह स्ट्रैंड लेन्स, फोर्ट विलियम स्थित परिवारिक आवास से अपनी इकाई में लौटने के लिए निकले, लेकिन फिर ड्यूटी पर नहीं पहुंचे।
उन्होंने कहा कि उस समय उन्होंने हेस्टिंग्स पुलिस थाने में उनके लापता होने की सूचना दी थी, लेकिन अब उनके पास उस शिकायत की प्रति या सामान्य डायरी संख्या नहीं है। बाद में सेना ने उन्हें भगोड़ा दर्ज कर दिया। परिवार का कहना है कि वह जानबूझकर भगोड़ा नहीं बने थे, बल्कि अपनी तैनाती पर लौटते समय किसी अनहोनी के शिकार हुए थे। कुछ स्थानीय रिपोर्टों में नवीनतम शिकायत को अज्ञात लोगों द्वारा अपहरण के आरोप के रूप में भी बताया गया है।
वर्ष 1995 में बंगाल क्षेत्र प्रावोस्ट इकाई के कमांडिंग अधिकारी ने इस मामले को औपचारिक रूप से हेस्टिंग्स पुलिस के समक्ष उठाया था। बाद में श्रीमती राजन ने 2013 में हेस्टिंग्स पुलिस और 2018 में लालबाजार स्थित संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध) को भी अभ्यावेदन दिए।
उन्होंने कहा है कि उन्होंने सेना से किसी आर्थिक सहायता के बिना अपने तीन बच्चों का पालन-पोषण किया और भगोड़ा दर्जे के कारण परिवार पेंशन भी हासिल नहीं कर सकीं। परिवार के एक सदस्य ने इस नई कोशिश को न्याय पाने का उनका अंतिम प्रयास बताया है।
उन्होंने रविवार को पुलिस से प्राथमिकी दर्ज करने और समापन रिपोर्ट जारी करने का अनुरोध किया, ताकि वह पेंशन और अन्य लाभों के लिए आगे बढ़ सकें। पुलिस ने शिकायत स्वीकार कर पुराना रिकॉर्ड खंगालना शुरू कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि इतने पुराने मामले की पुनर्संरचना कठिन है, जिसमें यह तय करना भी शामिल है कि क्या वह हावड़ा से ट्रेन में चढ़े थे या बीच के किसी स्टेशन पर यात्रा से उतर गए थे।
सेना सूत्रों ने सेना अधिनियम के तहत सामान्य प्रक्रिया समझाई है। अनधिकृत अनुपस्थिति को पहले बिना छुट्टी अनुपस्थिति माना जाता है। यदि कोई सैनिक 30 दिन तक लापता रहता है, तो धारा 106 के तहत जांच अदालत आवश्यक होती है; इसके बाद उसे अनुमानित भगोड़ा घोषित किया जा सकता है।
लंबे समय तक लापता रहने वाले मामलों में सेवा अभिलेखों में अक्सर व्यक्ति को भगोड़ा ही दिखाया जाता है। ऐसे मामलों में सामान्यतः केवल भविष्य निधि की राशि मिलती है, परिवार पेंशन नहीं।
अधिकारियों का कहना है कि यदि पुलिस यह दर्ज करती है कि सैनिक अपनी इच्छा से नहीं भागा था, उदाहरण के लिए यदि वह किसी दुर्घटना का शिकार हुआ था, तो भगोड़ा दर्जे पर पुनर्विचार किया जा सकता है और अन्य लाभों की जांच की जा सकती है। पेंशन प्रक्रिया से पहले दर्जे में यह बदलाव होना जरूरी होगा।
परिवार की तत्काल मांग इसलिए प्रक्रियात्मक है कि पुलिस प्राथमिकी दर्ज करे और 1990 की गुमशुदगी पर लिखित निष्कर्ष दे। उन्हें उम्मीद है कि इससे सेना के अभिलेख एडविन राजन को भगोड़ा नहीं, बल्कि लापता मानेंगे और परिवार पेंशन का रास्ता खुलेगा।