गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के एक सहायक उप-निरीक्षक के गुवाहाटी से छत्तीसगढ़ स्थानांतरण में दखल देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि उनकी पत्नी की चिंता से जुड़ी बीमारी और परिवार की कठिनाइयाँ, तैनाती पर रोक लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं।
न्यायमूर्ति संजय कुमार मेहदी ने 1 अक्टूबर के आदेश में कहा कि स्थानांतरण सेवा का हिस्सा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका पर केवल तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब वैधानिक नियमों का उल्लंघन हो या दुर्भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
स्थानांतरण और चुनौती
याचिकाकर्ता, जो सामान्य ड्यूटी के सहायक उप-निरीक्षक हैं, गुवाहाटी के अमेरिगोग में तैनात थे। 24 दिसंबर 2025 के आदेश के तहत उन्हें छत्तीसगढ़ में 231 बटालियन में स्थानांतरित किया गया था।
उन्होंने अधिवक्ता डी. गोगोई और टी. वांगप्ला के माध्यम से इस आदेश को चुनौती दी। उनका मुख्य तर्क था कि वे अपनी पत्नी के एकमात्र देखभालकर्ता हैं, जो चिंता संबंधी बीमारी से पीड़ित हैं, और परिवार को अन्य कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने अपनी बेटी की नीट परीक्षा की तैयारी का भी हवाला दिया, हालांकि अदालत ने दर्ज किया कि यह परीक्षा अब समाप्त हो चुकी है।
अधिवक्ता ने बताया कि इन कठिनाइयों को देखते हुए पहले अतिरिक्त समय दिया गया था और असम में चुनावों के कारण स्थानांतरण को भी कुछ समय के लिए स्थगित रखा गया था। 18 मई को एक अंतरिम आदेश भी पारित किया गया था।
केंद्रीय सरकार के अधिवक्ता आर. देवी ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि स्थानांतरण को चुनौती देने का दायरा सीमित है, न तो दुर्भावना का आरोप लगाया गया है और न ही वैधानिक नियमों के उल्लंघन का। उन्होंने यह भी कहा कि मामले पर पहले ही विचार हो चुका है और समय भी दिया जा चुका है।
अदालत ने क्या कहा
न्यायमूर्ति मेहदी ने अपने आदेश में कहा कि स्थानांतरण आदेश में हस्तक्षेप की सीमा “अत्यंत सीमित” है। उन्होंने दर्ज किया कि जब तक वैधानिक नियमों का उल्लंघन या स्पष्ट दुर्भावना न हो, अदालत हस्तक्षेप करने से बचेगी। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि 24 दिसंबर 2025 को आदेश जारी होने के बावजूद याचिकाकर्ता को पर्याप्त समय मिल चुका था।
अदालत ने माना कि उसके समक्ष रखे गए आधार हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते। इसके साथ ही उसने स्थानांतरण को निरस्त करने या उस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
चिकित्सकीय पहलू पर अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को नए तैनाती स्थल पर याचिका में बताई गई बीमारी के लिए अपनी पत्नी के उपचार की उचित व्यवस्था करने का अवसर दिया जाए। उन्हें स्थानांतरण के लिए 15 दिन का समय दिया गया।
यह निर्णय उस स्थापित सिद्धांत के अनुरूप बताया गया है, जिसके अनुसार वर्दीधारी बल में परिवार के किसी सदस्य की बीमारी सहित व्यक्तिगत कठिनाई, अपने-आप में स्थानांतरण का विरोध करने का अधिकार नहीं देती, जब तक आदेश नियमों के विरुद्ध न हो या उसमें दुर्भावना न हो।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने जून में भी ऐसा ही रुख अपनाया था, जब न्यायमूर्ति शमीमा जहाँ ने एक सीआरपीएफ सिपाही के ओडिशा स्थानांतरण पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। तब उनकी पत्नी के प्रसव के बाद की जटिलताओं का हवाला दिया गया था, लेकिन अदालत ने नए स्थान पर चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता का उल्लेख किया था।