नई दिल्ली, 10 सितंबर 2026 — टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड ने रक्षा मंत्रालय की उस प्रतिस्पर्धा में सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी के रूप में स्थान हासिल किया है, जिसमें भारतीय सेना के लिए अगली पीढ़ी का 25 टन श्रेणी का हल्का टैंक विकसित किया जाना है। यह परियोजना ऑपरेशन ज़ोरावर के तहत चलाई जा रही है और इसकी अनुमानित लागत लगभग 20,000 करोड़ रुपये है।
यह कार्यक्रम मेक-वन श्रेणी के तहत लागू किया जा रहा है और इसका उद्देश्य ऊँचाई वाले क्षेत्रों तथा दुर्गम इलाकों में तेज़ी से तैनात किए जा सकने वाले बख्तरबंद प्लेटफॉर्म की सेना की आवश्यकता को पूरा करना है। तीन वर्षों तक चली तकनीकी और व्यावसायिक बोलियों की समीक्षा के बाद यह चयन हुआ, जिसमें पांच कॉरपोरेट संस्थाओं ने भाग लिया था।
महिंद्रा डिफेन्स सिस्टम्स दूसरे सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी के रूप में सामने आई है और उसे भी प्रोटोटाइप विकसित करने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड को 130 सप्ताह के भीतर दो कार्यशील प्रोटोटाइप विकसित कर प्रदर्शित करने की जिम्मेदारी दी गई है।
ऑपरेशन ज़ोरावर और एएफवी-आईएलटी आवश्यकता
ऑपरेशन ज़ोरावर, बख्तरबंद लड़ाकू वाहन–भारतीय हल्का टैंक कार्यक्रम से जुड़ा है। भारतीय सेना को ऐसा हल्का टैंक चाहिए, जो लद्दाख जैसे ऊँचाई वाले क्षेत्रों के लिए अनुकूल हो, जहाँ टी-72 और टी-90 जैसे भारी मुख्य युद्धक टैंकों की गतिशीलता, रसद और ऑक्सीजन की कमी वाली परिस्थितियों में सीमाएँ सामने आती हैं।
कुल आवश्यकता आम तौर पर 354 हल्के टैंकों की बताई जाती है। इनमें 59 इकाइयों का पहला बैच पहले ही रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन को लार्सन एंड टुब्रो के साथ साझेदारी में सौंपा जा चुका है। शेष लगभग 295 टैंक प्रतिस्पर्धी मेक-वन प्रक्रिया के अंतर्गत आते हैं, जिनके लिए अब टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और महिंद्रा का चयन किया गया है।
प्रोटोटाइपों के मूल्यांकन के बाद उत्पादन आदेश दोनों कंपनियों के बीच बांटे जाने की उम्मीद है। इस टैंक का नाम जनरल ज़ोरावर सिंह कहलोन के नाम पर रखा गया है, जिन्हें ज़ोरावर सिंह कहलूरिया के नाम से भी जाना जाता है। वे 19वीं सदी के डोगरा कमांडर थे, जिन्होंने लद्दाख, बाल्तिस्तान और पश्चिमी तिब्बत में अभियान चलाए थे।
मेक-वन श्रेणी के तहत खरीद
यह कार्यक्रम रक्षा मंत्रालय की मेक-वन श्रेणी के तहत लागू किया जा रहा है। इस ढांचे में प्रोटोटाइप की डिजाइन और विकास लागत का 70 प्रतिशत तक सरकारी वित्तपोषण का प्रावधान है, ताकि स्वदेशी डिजाइन, निजी क्षेत्र की भागीदारी और आयात निर्भरता में कमी को बढ़ावा दिया जा सके।
एक प्रतिस्पर्धी बोलीदाता की आपत्तियों के बाद उत्पादन आदेश जारी करने में देरी हुई थी। भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय की समीक्षा के बाद ये आपत्तियाँ स्वीकार नहीं की गईं और अब प्रक्रिया आगे बढ़ गई है। यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पहली बार कोई निजी क्षेत्र की कंपनी भारतीय सशस्त्र बलों के लिए एक युद्धक टैंक को पूरी तरह डिजाइन और निर्मित करेगी।
प्लेटफॉर्म की विशेषताएँ
25 टन श्रेणी के इस हल्के टैंक को तेज़ तैनाती के लिए तैयार किया जा रहा है, जिसमें हवाई परिवहन भी शामिल है। भारतीय वायु सेना के सी-17 ग्लोबमास्टर III में दो वाहन ले जाए जा सकते हैं।
मौजूदा डीआरडीओ–लार्सन एंड टुब्रो ज़ोरावर डिजाइन से जुड़ी जिन विशेषताओं का उल्लेख किया गया है, उनमें 105 मिमी उच्च-दाब राइफलयुक्त तोप के साथ स्वचालित लोडर, रिमोट वेपन स्टेशन, नाग एमके-II टैंक-रोधी निर्देशित मिसाइलें या घूमकर वार करने वाले हथियारों की सुविधा, स्टैनैग 4569 स्तर 4 अग्र सुरक्षा के अनुरूप मॉड्यूलर कवच, सक्रिय सुरक्षा प्रणाली, उभयचर क्षमता और पहाड़ी गतिशीलता के लिए उच्च शक्ति-से-भार अनुपात शामिल हैं।
यह प्लेटफॉर्म केवल ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि रेगिस्तानों, दलदली इलाकों और नदी-तटीय भूभाग में भी काम करने के लिए बनाया जा रहा है, ताकि सेना को विभिन्न परिचालन क्षेत्रों में पारंपरिक मुख्य युद्धक टैंकों के मुकाबले एक हल्का विकल्प मिल सके।
स्वदेशी रक्षा निर्माण के लिए महत्व
बोली के नतीजे जटिल बख्तरबंद वाहन कार्यक्रमों में भारतीय निजी उद्योग की भूमिका को मजबूत करते हैं। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड की एल1 स्थिति और महिंद्रा को मिला समानांतर प्रोटोटाइप दायित्व प्रतिस्पर्धा बनाए रखने, आपूर्ति शृंखला में विकल्प उपलब्ध कराने और बड़े पैमाने के उत्पादन से पहले सेना को एक से अधिक डिजाइन परखने का अवसर देने के लिए है।
130 सप्ताह की प्रोटोटाइप समय-सीमा मेक-वन ढांचे के तहत तकनीकी और समय-निर्धारण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने की दोनों कंपनियों की क्षमता की अहम परीक्षा होगी। यह परियोजना घरेलू डिजाइन और प्रमुख भू-आधारित प्रणालियों के उत्पादन को बढ़ाने तथा भारत की उत्तरी सीमाओं के ऊँचाई वाले वातावरण के लिए विशेष हल्का टैंक तैयार करने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।