नई दिल्ली, 3 अक्टूबर 2026: रूस की सेना में भर्ती किए गए करीब 140 भारतीय नागरिकों को रिहा कर दिया गया है, जबकि भारत 55 अन्य लोगों का पता लगाने की कोशिश कर रहा है, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वे अभी भी सेवा में हैं। यह जानकारी विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अध्यक्षता में भारत-रूस संबंधों पर हुई परामर्श समिति की बैठक में साझा की गई।
बैठक में दी गई जानकारी के अनुसार, भारत सरकार ने ऐसे सभी लोगों की जल्द रिहाई के लिए रूसी अधिकारियों से, उच्चतम स्तर तक, संपर्क किया है। बैठक से मिली जानकारी में कहा गया, “अब तक करीब 140 भारतीय नागरिकों को रिहा किया गया है। भारतीय पक्ष उन 55 भारतीय नागरिकों के बारे में रूसी अधिकारियों के संपर्क में है, जिनके बारे में बताया जा रहा है कि वे रूसी सेना में हैं। भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियां ऐसे बेईमान एजेंटों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही हैं।”
यह आंकड़े विदेश सचिव विक्रम मिसरी की पिछली जानकारी के बाद सामने आए हैं। उन्होंने पिछले महीने किर्गिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के दौरान बताया था कि भारत के पास रूसी सेना में भर्ती किए गए 227 भारतीय नागरिकों की जानकारी है, जिनमें से 139 को रिहा किया जा चुका था और 51 की मृत्यु हो चुकी थी। उन्होंने कहा था कि यह मुद्दा “विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न अवसरों पर” मास्को के समक्ष उठाया गया है और मॉस्को स्थित दूतावास रिहाई तथा स्वदेश वापसी की प्रक्रिया पर नजर रखे हुए है, ताकि बचे हुए मामलों में जल्द से जल्द रिहाई हो सके।
जुलाई में विदेश मंत्रालय ने कहा था कि कूटनीतिक प्रयासों से 139 भारतीयों की रिहाई सुनिश्चित की गई है और लगभग दो दर्जन लोग अभी भी कथित रूप से सेवा में हैं। अब 55 लोगों का पता लगाए जाने की बात से संकेत मिलता है कि नई दिल्ली पहले की तुलना में अधिक मामलों में स्पष्टता चाहती है।
यह मुद्दा तब से द्विपक्षीय एजेंडे में बना हुआ है, जब यह खबरें सामने आई थीं कि भारतीय नागरिक पर्यटक या छात्र वीजा पर रूस गए थे और उन्हें रसोइया या सहायक जैसे नागरिक काम का प्रलोभन दिया गया। बाद में उन्हें रूसी भाषा में अनुबंधों पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित किया गया और फिर यूक्रेन संघर्ष में सैन्य इकाइयों के साथ तैनात कर दिया गया। प्रभावित लोगों में बड़ी संख्या पंजाब, हरियाणा और अन्य उत्तरी राज्यों से है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई 2024 में मास्को में वार्षिक भारत-रूस शिखर बैठक के दौरान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के समक्ष यह मुद्दा उठाया था। सितंबर की शुरुआत में क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा था कि रूस युद्ध क्षेत्र में मौजूद भारतीय नागरिकों की सूची तैयार कर रहा है और उनकी पहचान होते ही उन्हें घर भेजा जाएगा। उन्होंने भारतीय पक्ष के साथ संपर्क को “गहरा और व्यापक” बताया था।
30 सितंबर को विदेश मंत्रालय ने एक नई सलाह जारी कर भारतीयों को रूसी सशस्त्र बलों में शामिल होने से सख्ती से बचने की अपील की। इसमें “मृत्युपरक खतरों” की चेतावनी दी गई, पहले की अपीलों के बावजूद भर्ती जारी रहने की बात कही गई और कहा गया कि कुछ लोगों ने धन लाभ और बाद में भारतीय सरकार के जरिये रिहाई की उम्मीद में स्वेच्छा से ऐसे प्रस्ताव स्वीकार किए थे।
सलाह में ऐसे मामलों का भी उल्लेख किया गया, जिनमें कुछ नागरिकों ने भारतीय नागरिकता त्यागने, रूसी पासपोर्ट लेने और फिर सेना में भर्ती होने के लिए अधिकारियों से संपर्क किया था। मंत्रालय ने गैर-सार्वजनिक संस्थाओं और पंजीकृत न होने वाले एजेंटों की नौकरी की पेशकशों से सावधान रहने की चेतावनी भी दी।
प्रभावित लोगों के परिवारों ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख कर दूतावासीय हस्तक्षेप, सेवा में मौजूद लोगों के ठिकाने की पुष्टि, उनकी स्वदेश वापसी, मृत अवशेषों की वापसी और मुआवजे की मांग की है। भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियां भर्ती में मदद करने के आरोपित एजेंटों के खिलाफ कार्रवाई कर रही हैं।
जयशंकर ने बैठक के बाद एक्स पर लिखा कि समिति ने व्यापार, निवेश, ऊर्जा, संपर्क, संस्कृति और जन-से-जन संबंधों में बहुआयामी भारत-रूस जुड़ाव की समीक्षा की, साथ ही यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए संवाद और कूटनीति के प्रति भारत के समर्थन पर भी चर्चा की। यह चर्चा उस समय हुई, जब कुछ दिन पहले राष्ट्रपति पुतिन ने वाल्दाई चर्चा मंच पर स्वीकार किया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने घनिष्ठ द्विपक्षीय संबंधों के बावजूद संघर्ष समाप्त करने का सवाल लगातार उठाया है।