असम-मेघालय कैडर की 2006 बैच की भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी डॉ. संजुक्ता पराशर ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की विशिष्ट कमांडो बटालियन फॉर रिज़ोल्यूट एक्शन यानी कोबरा के महानिरीक्षक के रूप में कार्यभार संभाल लिया है। उन्हें असम की “आयरन लेडी” के नाम से भी जाना जाता है। वह इस विशेष जंगली युद्ध बल की कमान संभालने वाली पहली महिला अधिकारी हैं।
सीआरपीएफ मुख्यालय ने पिछले सप्ताह इस संबंध में आदेश जारी किया था। पराशर ने 1996 बैच के आईपीएस अधिकारी दानेश राणा का स्थान लिया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि दस बटालियन वाली कोबरा इकाई का नेतृत्व पहली बार किसी महिला के हाथों में गया है।
गृह मंत्रालय ने इससे पहले उन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर सीआरपीएफ में महानिरीक्षक नियुक्त किया था। इस संबंध में आदेश 6 अगस्त 2026 को जारी हुए थे। अब उन्होंने कोबरा की कार्यकारी कमान संभाल ली है।
कोबरा के बारे में
कोबरा, यानी कमांडो बटालियन फॉर रिज़ोल्यूट एक्शन, को सीआरपीएफ ने 2008–09 में कई राज्यों में वामपंथी उग्रवाद और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में विद्रोह के खिलाफ खुफिया-आधारित जंगली और गुरिल्ला युद्ध के लिए खड़ा किया था। इसके कमांडो लंबे दूरी के अभियानों, घने जंगलों में कार्रवाई, घात और प्रति-घात, आईईडी खतरों तथा हथियारबंद उग्रवादियों के खिलाफ सटीक कार्रवाई के लिए प्रशिक्षित हैं।
इस इकाई ने छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र में व्यापक रूप से संचालन किया है। हाल ही में मणिपुर में दो कोबरा इकाइयों की तैनाती की गई थी, ताकि हथियारबंद हिंसा पर अंकुश लगाया जा सके। गृह मंत्रालय ने कोबरा कमांडो की उन कार्रवाइयों का श्रेय भी दिया है, जिनके चलते मार्च 2026 में देश में माओवादी हिंसा का अंत हुआ।
करियर और पृष्ठभूमि
3 अक्टूबर 1979 को असम में जन्मी पराशर ने दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज फॉर विमेन से राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की। बाद में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय संबंध और अमेरिकी विदेश नीति में परास्नातक, एमफिल और पीएचडी पूरी की। उन्होंने 2005 की यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में अखिल भारतीय रैंक 85 हासिल की और भारतीय प्रशासनिक सेवा के बजाय भारतीय पुलिस सेवा को चुना।
उन्होंने 29 अगस्त 2006 को सेवा ज्वाइन की और कैडर के तहत सीधे असम में तैनात होने वाली पहली असमिया महिला आईपीएस अधिकारी बनीं। उनकी शुरुआती तैनातियों में माकुम और उदलगुड़ी शामिल थे, जहां उन्होंने जातीय झड़पों से निपटा। बाद में सोनितपुर में पुलिस अधीक्षक के रूप में उन्होंने 15 महीनों में 16 बड़े मुठभेड़ अभियान चलाए, जिनमें 16 उग्रवादी मारे गए और 64 गिरफ्तार किए गए।
वे अक्सर जवानों के साथ जंगलों में भी गईं, जिनमें असम पुलिस कमांडो और कोबरा जवानों के साथ किए गए अभियान भी शामिल थे। इन्हीं क्षेत्रीय तैनातियों के कारण उन्हें “असम की आयरन लेडी” की लोकप्रिय उपाधि मिली। बाद में उन्होंने राष्ट्रीय जांच एजेंसी में उप महानिरीक्षक के रूप में राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी मामलों की जांच संभाली।
उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक, विशिष्ट सेवा के लिए मिला पुलिस पदक, पुलिस प्रशिक्षण में उत्कृष्टता के लिए गृह मंत्री पदक (2022) और रानी गाइदिनल्यू जेलियांग पुरस्कार मिल चुका है।
नियुक्ति का महत्व
यह तैनाती असम के उग्रवाद-प्रभावित जंगलों में पराशर के परिचालन अनुभव और एनआईए में उनके जांच कार्य, दोनों को एक साथ जोड़ती है। ऐसी इकाई के लिए, जिसके मुख्य कार्यों में जंगली युद्ध, खुफिया-आधारित अभियान और प्रतिकूल भूभाग में अनुकूलन शामिल हैं, यह अनुभव सीधे तौर पर प्रासंगिक माना जा रहा है।
यह नियुक्ति भारत की अर्धसैनिक बलों में परिचालन कमान संभालने वाली महिला अधिकारियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। पराशर अब सीआरपीएफ की सबसे चुनौतीपूर्ण विशेष इकाइयों में से एक का नेतृत्व कर रही हैं, जबकि कोबरा का उपयोग अभी भी वामपंथी उग्रवाद के बचे हुए इलाकों और मणिपुर जैसे संवेदनशील आंतरिक सुरक्षा क्षेत्रों में किया जा रहा है।