दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रादेशिक सेना के अधिकारी पदों की पुरुष और महिला उम्मीदवारों के बीच की गई रिक्तियों के आवंटन को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि 2022 से होने वाली भर्तियों में महिलाओं के लिए केवल एक ही रिक्ति रखी जा रही है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने कुस कलरा की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया। मामला प्रादेशिक सेना में अधिकारियों की भर्ती नीति और पुरुष तथा महिला उम्मीदवारों के लिए रिक्तियों के बंटवारे से जुड़ा है।
याचिका के अनुसार, 2022 में प्रादेशिक सेना भर्ती प्रक्रिया में पुरुषों के लिए 12 और महिलाओं के लिए एक रिक्ति थी। 2023 और 2025 के लिए पुरुषों के 18-18 तथा महिलाओं के लिए एक-एक रिक्ति बताई गई है, जबकि 2026 की भर्ती में पुरुषों के लिए 11 और महिलाओं के लिए एक रिक्ति दी गई है।
याचिकाकर्ता ने इसे लगातार बनी असमानता बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के उल्लंघन का आरोप लगाया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि रिक्तियों की यह संरचना प्रादेशिक सेना में महिलाओं की नियुक्ति को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय के पहले के निर्णय के अनुरूप नहीं है।
इस मामले की पृष्ठभूमि 2018 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले से जुड़ी है, जिसमें कुस कलरा बनाम भारत सरकार मामले में प्रादेशिक सेना में महिलाओं को भर्ती से बाहर रखने की चुनौती पर विचार किया गया था। अदालत ने माना था कि प्रादेशिक सेना अधिनियम, 1948 की धारा 6 में प्रयुक्त “कोई भी व्यक्ति” का अर्थ पुरुष और महिला दोनों है। साथ ही, महिलाओं को नियुक्ति से बाहर रखने वाली तत्कालीन विज्ञप्तियों और नीति को उसी सीमा तक रद्द किया गया था।
2018 के फैसले में यह भी कहा गया था कि धारा 6 के अनुसार भारत का कोई भी नागरिक निर्धारित शर्तों के अधीन नामांकन के लिए स्वयं को प्रस्तुत कर सकता है। अदालत ने इसे धारा 6ए से अलग माना, जिसमें अनिवार्य सेवा के संबंध में महिलाओं को लेकर एक विशिष्ट वैधानिक अपवर्जन है।
वर्तमान याचिका में आरोप लगाया गया है कि पहले के फैसले के बावजूद पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग रिक्ति आवंटन जारी है। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि लगातार भर्ती चरणों में महिलाओं को केवल एक रिक्ति तक सीमित रखना क्या उस कानूनी स्थिति के अनुरूप है, जो पहले के निर्णय से स्थापित हुई थी। ये याचिकाकर्ता के दावे हैं और इन पर अदालत विचार करेगी।
अभी की कार्यवाही का अर्थ इस नीति की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं है। खंडपीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है।
यह मामला प्रादेशिक सेना में महिलाओं के प्रवेश के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2018 के फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि धारा 6 के तहत “कोई भी व्यक्ति” का अर्थ महिलाओं को बाहर रखने वाला नहीं पढ़ा जा सकता। अब की याचिका रिक्तियों के बाद के आवंटन और पुरुषों तथा महिलाओं के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या में अंतर की कानूनी वैधता पर केंद्रित है।
अदालत की आगे की जांच में आवेदन की पात्रता और रिक्तियों की संरचना के बीच का अंतर देखा जाएगा। पहले का फैसला महिलाओं को प्रादेशिक सेना भर्ती से बाहर रखने से संबंधित था, जबकि मौजूदा याचिका पुरुष और महिला उम्मीदवारों के बीच कथित असमानता को चुनौती देती है।
यह विषय सशस्त्र बलों में महिलाओं की भर्ती और सेवा अवसरों से जुड़े व्यापक कानूनी मामलों की कड़ी का भी हिस्सा है। एक अलग 2025 मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सेना की कुछ कोर और सेवाओं में पुरुषों की रिक्तियों के खाली रहने तथा उन रिक्तियों के विरुद्ध महिला उम्मीदवारों पर विचार से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई की थी। वह मामला अलग भर्ती परिस्थितियों से संबंधित था और उसे मौजूदा प्रादेशिक सेना रिक्ति विवाद पर निर्णय नहीं माना जाना चाहिए।
अब केंद्र का जवाब आगे की कार्यवाही में अहम कदम होगा। सरकार को रिक्ति आवंटन का आधार बताने और याचिकाकर्ता के इस तर्क पर जवाब देने का अवसर मिलेगा कि मौजूदा ढांचा संवैधानिक गारंटियों और दिल्ली उच्च न्यायालय के पहले के फैसले के अनुरूप नहीं है।
इस तरह, दिल्ली उच्च न्यायालय का नोटिस प्रादेशिक सेना अधिकारी भर्ती में लिंग आधारित रिक्ति आवंटन के प्रश्न को न्यायिक जांच के दायरे में ले आया है, जबकि मौजूदा नीति की वास्तविक वैधता पर अभी निर्णय होना बाकी है।