कर्नल पुन्यबाची मोहंती, वाईएसएम, एसएम, ओडिशा के एक अलंकृत भारतीय सेना अधिकारी हैं, जिन्होंने प्रतिष्ठित 9वीं बटालियन, द पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज), यानी 9 पारा एसएफ के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में सेवा की। वह दूसरी पीढ़ी के सैन्य अधिकारी हैं और उन्होंने अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए भारतीय सेना में एक अलग और सफल पहचान बनाई।
उनके सम्मान दो अलग-अलग परिचालन वातावरणों में सेवा को दर्शाते हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर से जुड़ी आतंकवाद-रोधी जिम्मेदारियाँ और पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर टकराव के दौरान की गई सैन्य कार्रवाई शामिल है।
उनका सैन्य सफर पारिवारिक परंपरा, पेशेवर दक्षता और परिचालन नेतृत्व के उस मिश्रण को दिखाता है, जिसकी आवश्यकता भारतीय सेना की सबसे सम्मानित विशेष बल बटालियनों में से एक की कमान संभालने के लिए होती है।
एक प्रतिष्ठित सैन्य परिवार
कर्नल पुन्यबाची मोहंती का संबंध भारतीय सेना से लंबे समय से जुड़े परिवार से है। उनके पिता लेफ्टिनेंट जनरल जे.के. मोहंती, पीवीएसएम, यूवाईएसएम, एसएम, वीएसएम, डोगरा रेजिमेंट के वरिष्ठ अधिकारी रहे और आगे चलकर सेना की केंद्रीय कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ बने। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने जनवरी 2009 से फरवरी 2010 तक सेना कमांडर के रूप में कार्य किया।
लेफ्टिनेंट जनरल मोहंती को अपने करियर में परम विशिष्ट सेवा पदक, उत्तम युद्ध सेवा पदक, सेना पदक और विशिष्ट सेवा पदक सहित कई प्रमुख सैन्य सम्मान मिले।
जब कर्नल पुन्यबाची मोहंती को 2021 में युद्ध सेवा पदक मिला, तब ओडिशा में प्रकाशित रिपोर्टों में पिता-पुत्र के करियर की समानताओं को रेखांकित किया गया। दोनों अधिकारी डोगरा रेजिमेंट से जुड़े रहे, दोनों ने महत्वपूर्ण परिचालन जिम्मेदारियाँ संभालीं और दोनों को अपनी सेवा के लिए सैन्य सम्मान प्राप्त हुए।
हालाँकि, कर्नल मोहंती की उपलब्धियाँ उनकी अपनी सैन्य प्रगति का परिणाम हैं। इसमें पैराशूट रेजिमेंट के विशेष बलों के लिए स्वयंसेवा करने और वहाँ सेवा देने की कठिन प्रक्रिया भी शामिल है।
डोगरा रेजिमेंट से पैरा स्पेशल फोर्सेज तक
कर्नल पुन्यबाची मोहंती को डोगरा रेजिमेंट में कमीशन मिला, जो वही रेजिमेंट थी जिसमें उनके पिता सेवा कर चुके थे। इसके बाद उन्होंने भारतीय सेना के विशेष बलों में शामिल होने के लिए स्वयंसेवा की।
पैरा एसएफ बटालियन में प्रवेश स्वतः नहीं होता। इन इकाइयों के लिए स्वयंसेवा करने वाले अधिकारियों और सैनिकों को असाधारण रूप से कठिन परिवीक्षा से गुजरना पड़ता है, जिसमें शारीरिक सहनशक्ति, मानसिक दृढ़ता, सामरिक क्षमता, प्रेरणा और अत्यधिक दबाव में काम करने की योग्यता की परीक्षा ली जाती है।
जो लोग चयन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी करते हैं, उन्हें ही स्थायी रूप से विशेष बल बटालियन में शामिल किया जाता है।
कर्नल मोहंती 9वीं बटालियन, द पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज) से जुड़े। यह इकाई भारतीय सेना की सबसे पुरानी और सम्मानित विशेष बल संरचनाओं में से एक है और पहाड़ी भूभाग, आतंकवाद-रोधी अभियानों तथा अन्य रणनीतिक रूप से संवेदनशील जिम्मेदारियों में इसका व्यापक अनुभव रहा है।
रजिमेंट के अधिकारी से 9 पारा एसएफ के कमांडिंग ऑफिसर तक उनकी प्रगति एक बड़ी पेशेवर उपलब्धि थी। किसी भी पैदल सेना बटालियन की कमान सेना अधिकारी के करियर की प्रमुख नियुक्तियों में मानी जाती है, जबकि विशेष बल बटालियन की कमान संवेदनशील, विशिष्ट और अक्सर उच्च जोखिम वाले कार्यों के कारण अतिरिक्त जिम्मेदारी लेकर आती है।
2019 में सेना पदक
तब लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर रहे कर्नल मोहंती को अगस्त 2019 में घोषित स्वतंत्रता दिवस सैन्य पुरस्कारों में सेना पदक प्रदान किया गया।
रक्षा मंत्रालय की आधिकारिक सूची में उन्हें सेवा संख्या आईसी-63780एल के साथ दर्ज किया गया और उनकी इकाई 9वीं बटालियन, द पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज) बताई गई।
उस समय की रिपोर्टों में लेफ्टिनेंट कर्नल पुन्यबाची मोहंती को वीरता के लिए सेना पदक पाने वालों में शामिल बताया गया। विशेष बलों के अभियानों से जुड़े विस्तृत विवरण अक्सर परिचालन सुरक्षा कारणों से सार्वजनिक नहीं किए जाते, इसलिए ओडिशा की रिपोर्टों ने इस सम्मान को 9 पारा एसएफ में उनकी विशिष्ट सेवा से जोड़ा।
यह पुरस्कार उनके कमान संभालने से पहले ही उन्हें एक महत्वपूर्ण परिचालन अनुभव वाले अधिकारी के रूप में स्थापित कर चुका था।
2021 में युद्ध सेवा पदक
कर्नल पुन्यबाची मोहंती को जनवरी 2021 में घोषित गणतंत्र दिवस सम्मान के तहत युद्ध सेवा पदक प्रदान किया गया। आधिकारिक पुरस्कार सूची में उनका नाम इस प्रकार दर्ज था: आईसी-63780एल कर्नल पुन्यबाची मोहंती, एसएम, 9 पारा (एसएफ)।
2021 के गणतंत्र दिवस सम्मान में राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित सैन्य अलंकरणों के तहत 11 युद्ध सेवा पदक शामिल थे। युद्ध, संघर्ष या सैन्य अभियानों के दौरान उच्च स्तर की विशिष्ट सेवा के लिए यह पदक दिया जाता है। यह सेना पदक से अलग है, जो विशेष रूप से वीरता के लिए प्रदान किया जाता है।
उस समय प्रकाशित रिपोर्टों में कर्नल मोहंती को 9 पारा एसएफ के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में पहचाना गया और पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना की कार्रवाइयों से उनके सम्मान को जोड़ा गया। सीमा संकट के जवाब में की गई व्यापक सैन्य तैनाती को ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के नाम से जाना गया। यह 2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन के बीच बढ़े तनाव के बाद शुरू हुआ था।
ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के दौरान नेतृत्व
पूर्वी लद्दाख संकट ने भारत और चीन के बीच दशकों की सबसे गंभीर सैन्य टकराव की स्थिति पैदा की। जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारतीय सेना ने पूर्वी लद्दाख में अपनी तैनाती मजबूत की। सैनिकों को अत्यधिक ऊँचाई वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भेजा गया, जहाँ उन्हें कठोर ठंड, कठिन भूभाग, सीमित ऑक्सीजन और भारी रसद चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
ऑपरेशन स्नो लेपर्ड में अलग-अलग क्षमताओं वाली इकाइयों की लामबंदी और तैनाती शामिल थी। विशेष बल इकाइयों ने कठिन भूभाग और संवेदनशील परिचालन स्थितियों के लिए उपयुक्त विशेष टोही, त्वरित प्रतिक्रिया और सामरिक क्षमताएँ प्रदान कीं।
इस अवधि में 9 पारा एसएफ के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में कर्नल मोहंती पर इकाई की परिचालन तैयारी, प्रशिक्षण स्तर, प्रशासन और सौंपे गए अभियानों के लिए तत्परता बनाए रखने की जिम्मेदारी रही होगी।
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों में इस ऑपरेशन के दौरान कर्नल मोहंती या उनकी बटालियन की विस्तृत गतिविधियों का उल्लेख नहीं है। विशेष बलों की तैनाती और कार्यपद्धति के बारे में जानकारी आमतौर पर सीमित ही रहती है। फिर भी, युद्ध सेवा पदक इस बात का संकेत है कि उनकी सेवा और नेतृत्व को उच्चतम स्तर पर मान्यता मिली।
ऊधमपुर में अलंकरण समारोह
बाद में मार्च 2022 में उधमपुर में आयोजित उत्तरी कमान के अलंकरण समारोह में कर्नल मोहंती को युद्ध सेवा पदक प्रदान किया गया। वहाँ उन्हें विशिष्ट सेवा और परिचालन उपलब्धियों के लिए सम्मानित कई अधिकारियों और सैनिकों में शामिल किया गया।
समारोह की रिपोर्टों में कर्नल पुन्यबाची मोहंती को युद्ध सेवा पदक पाने वालों में सूचीबद्ध किया गया। वर्दी में सम्मान ग्रहण करते हुए उनकी तस्वीरें रक्षा-केंद्रित प्रकाशनों और ऑनलाइन समुदायों में व्यापक रूप से प्रसारित हुईं।
इस समारोह ने ऐसे अधिकारी को व्यापक सार्वजनिक ध्यान दिलाया, जिसका करियर मुख्यतः उन परिचालन संरचनाओं में बीता था जहाँ व्यक्तिगत विवरण शायद ही सार्वजनिक किए जाते हैं।
प्रतिष्ठित 9 पारा एसएफ की कमान
9वीं बटालियन, द पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज) भारत के विशेष बलों के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखती है। इसकी विशेष बल विरासत भारतीय सेना में कमांडो क्षमताओं के शुरुआती विकास से जुड़ी है और दशकों से इसने देश के सबसे कठिन सुरक्षा परिवेशों में कार्य किया है।
अन्य पैरा एसएफ बटालियनों की तरह 9 पारा एसएफ को भी विभिन्न प्रकार के विशेष अभियानों के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। परिचालन आवश्यकता के अनुसार ऐसी इकाइयों को रणनीतिक टोही, आतंकवाद-रोधी कार्रवाई, निगरानी, प्रत्यक्ष कार्रवाई और पहाड़ी या अन्य दुर्गम क्षेत्रों में मिशन सौंपे जा सकते हैं।
व्यक्तिगत पैरा एसएफ बटालियनों की सटीक गतिविधियाँ और तैनातियाँ सामान्यतः सार्वजनिक नहीं की जातीं। कमांडिंग ऑफिसर को यह सुनिश्चित करना होता है कि बटालियन युद्ध के हर पक्ष में तैयार रहे और विशेष बल कर्मियों से अपेक्षित शारीरिक दक्षता, विशिष्ट कौशल और परिचालन समन्वय भी बना रहे।
इसलिए यह नियुक्ति केवल व्यक्तिगत साहस नहीं, बल्कि सामरिक निर्णय क्षमता, प्रशासनिक योग्यता, भावनात्मक दृढ़ता और अधीनस्थों तथा वरिष्ठ कमांडरों दोनों के विश्वास की भी मांग करती है।
दो परिचालन मोर्चों पर सम्मान
कर्नल मोहंती के दो प्रमुख सम्मान युद्ध के अलग-अलग रूपों में की गई सेवा को दर्शाते हैं। 9 पारा एसएफ में रहते हुए मिला सेना पदक आतंकवाद-रोधी और घुसपैठ-रोधी अभियानों से जुड़ी बहादुरी का प्रतीक है। वहीं युद्ध सेवा पदक पूर्वी लद्दाख के टकराव से जुड़ी उच्च-तीव्रता वाली सैन्य तैनाती के दौरान उनकी विशिष्ट सेवा को मान्यता देता है।
आतंकवाद-रोधी अभियान और उच्च ऊँचाई पर किसी पारंपरिक सैन्य प्रतिद्वंद्वी के विरुद्ध तैनाती, दोनों में मूलभूत रूप से अलग चुनौतियाँ होती हैं। पहले प्रकार के अभियानों में सटीक खुफिया जानकारी, गति, आश्चर्य और राजनीतिक रूप से संवेदनशील परिस्थितियों में कठिन निर्णय लेने की क्षमता आवश्यक होती है। दूसरे में बड़े पैमाने की तैयारी, समन्वय, निगरानी, रसद-क्षमता और तेजी से बदलती सैन्य स्थिति के अनुरूप प्रतिक्रिया देने की योग्यता चाहिए होती है।
इन दोनों वातावरणों में सम्मान मिलना भारतीय सेना के विशेष बल अधिकारियों पर पड़ने वाली व्यापक परिचालन जिम्मेदारियों को दर्शाता है।
पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए
कर्नल पुन्यबाची मोहंती और लेफ्टिनेंट जनरल जे.के. मोहंती की तुलना स्वाभाविक है। दोनों डोगरा रेजिमेंट से जुड़े रहे, दोनों ने महत्वपूर्ण कमान जिम्मेदारियाँ संभालीं और दोनों को अपने-अपने करियर में सेना पदक तथा युद्ध सेवा पदक मिले।
लेकिन कर्नल मोहंती के करियर को केवल उनके पिता की उपलब्धियों के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। विशेष बलों के लिए स्वयंसेवा करना, परिवीक्षा सफलतापूर्वक पूरी करना, 9 पारा एसएफ में सेवा देना और अंततः बटालियन की कमान संभालना, यह सब पारिवारिक पृष्ठभूमि से अलग पेशेवर क्षमता की माँग करता है।
इस तरह उनका करियर निरंतरता और व्यक्तिगत उपलब्धि, दोनों का प्रतीक है। एक ओर सैन्य सेवा की पारिवारिक परंपरा की निरंतरता, दूसरी ओर भारतीय सेना की सबसे कठिन इकाइयों में से एक में चयन, प्रदर्शन और नेतृत्व के जरिए अर्जित उपलब्धि।
मौन पेशेवर दक्षता से चिह्नित करियर
विशेष बल अधिकारी अक्सर देश के प्रमुख कमांडरों या सर्वोच्च वीरता सम्मान पाने वालों जैसी सार्वजनिक चर्चा नहीं पाते। उनकी नियुक्तियाँ प्रायः गोपनीय रहती हैं और यहाँ तक कि पुरस्कार घोषणाओं में भी उन अभियानों का विस्तार कम ही दिया जाता है, जिनके लिए उन्हें सम्मानित किया गया।
फिर भी कर्नल पुन्यबाची मोहंती का सार्वजनिक रूप से दर्ज रिकॉर्ड एक ऐसे अधिकारी को सामने लाता है, जिन्होंने एक अभिजात बटालियन की कमान संभाली और दो प्रमुख परिचालन परिस्थितियों में सेवा के लिए मान्यता प्राप्त की।
डोगरा रेजिमेंट में प्रारंभिक सेवा से लेकर 9 पारा एसएफ के नेतृत्व तक उनका करियर उन मानकों को दर्शाता है जो भारतीय सेना के विशेष बलों से जुड़े माने जाते हैं—दृढ़ता, गोपनीयता, परिचालन विश्वसनीयता और दबाव में नेतृत्व।
कर्नल मोहंती की कहानी भारतीय सैन्य परंपरा के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाने का भी उल्लेखनीय उदाहरण है—लेकिन यह विरासत में मिली पहचान नहीं, बल्कि वर्दी में सेवा के माध्यम से फिर से अर्जित की गई जिम्मेदारी है।