भारतीय सेना अपने आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत 450 नवीनतम कार्ल गुस्ताफ एम4 84 मिमी कंधे से दागे जाने वाले रॉकेट प्रक्षेपक शामिल करने जा रही है। इससे अग्रिम पंक्ति की पैदल सेना इकाइयों की मारक क्षमता और संचालनगत गतिशीलता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।
स्वीडन की रक्षा कंपनी साब द्वारा विकसित यह नई पीढ़ी का प्रक्षेपक पुराने संस्करणों की जगह लेने के लिए तैयार है। इसे अधिक हल्का, अधिक बहुउपयोगी और बख्तरबंद लक्ष्यों के खिलाफ अधिक प्रभावी हथियार माना जा रहा है, जो भारत के विविध संचालन क्षेत्रों में उपयोगी रहेगा।
इसकी तैनाती का उद्देश्य पैदल सेना संरचनाओं की युद्ध क्षमता बढ़ाना है, खासकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में, जहां गतिशीलता, सहनशक्ति और त्वरित प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होती है। कार्ल गुस्ताफ एम4 का वजन सात किलोग्राम से कम है, जबकि इसका एम2 संस्करण लगभग 14 किलोग्राम और एम3 संस्करण लगभग 10 किलोग्राम का था।
कम वजन के कारण सैनिक इसे कठिन भूभाग में भी आसानी से ले जा सकेंगे, बिना मारक क्षमता से समझौता किए। इस प्रक्षेपक की प्रभावी मारक दूरी 1,000 मीटर तक है और यह शत्रु बंकरों, मजबूत ठिकानों, बख्तरबंद वाहनों तथा मुख्य युद्धक टैंकों को सटीक रूप से भेदने में सक्षम है।
सेना के प्रस्ताव अनुरोध के अनुसार, यह प्रक्षेपक 50 डिग्री सेल्सियस से लेकर माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भरोसेमंद ढंग से काम करने के लिए बनाया गया है। इससे इसे हिमालयी सीमाओं की कड़ाके की ठंड से लेकर थार मरुस्थल की भीषण गर्मी तक, देश के विभिन्न संचालन क्षेत्रों में तैनात किया जा सकेगा।
कार्ल गुस्ताफ एम4 की सबसे बड़ी ताकतों में इसकी विविध गोला-बारूद श्रृंखला है, जिसका बड़ा हिस्सा म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड में देश में ही बनाया जाता है। यह व्यापक गोला-बारूद परिवार हथियार प्रणाली को कई तरह की युद्ध भूमिकाएं निभाने में सक्षम बनाता है और पैदल सेना के लिए संचालनगत लचीलापन बढ़ाता है।
इस गोला-बारूद में घातक और गैर-घातक दोनों तरह के गोले शामिल हैं। गैर-घातक विकल्पों में टारगेट प्रैक्टिस ट्रेसर गोला शामिल है, जो वास्तविक गोला-बारूद जैसी प्रक्षेपवक्र देकर प्रशिक्षण के लिए उपयोग होता है। स्मोक गोला सैनिकों की आवाजाही को छिपाने और शत्रु की निगरानी बाधित करने के लिए धुएं की परत बनाता है, जबकि इल्युमिनेशन गोला रात के अभियानों में रोशनी उपलब्ध कराता है।
इसके घातक गोला-बारूद में हाई एक्सप्लोसिव डुअल पर्पस यानी एचईडीपी गोला शामिल है, जो हल्के बख्तरबंद वाहनों और क्षेत्रीय किलाबंदियों को भेदने के साथ-साथ शत्रु सैनिकों के खिलाफ विखंडन प्रभाव भी पैदा करता है। इसके अलावा, भारी बख्तरबंद लक्ष्यों को नष्ट करने के लिए समर्पित टैंक-रोधी गोला-बारूद भी इसमें मौजूद है।
भारतीय सेना कार्ल गुस्ताफ हथियार प्रणाली का पांच दशकों से अधिक समय से उपयोग कर रही है। पहली प्रक्षेपक इकाइयां 1974 में सेवा में आई थीं, जबकि 1976 में हुए सहयोग समझौते ने भारत में इसके शुरुआती संस्करणों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन का मार्ग प्रशस्त किया। समय के साथ एम2 और एम3 संस्करण सेना के पैदल सेना शस्त्रागार का अहम हिस्सा बन गए।
नवीनतम एम4 संस्करण अब हरियाणा के झज्जर में साब की उत्पादन सुविधा में बनाया जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में भारत की उदारीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति के तहत स्थापित यह संयंत्र देश की पहली पूर्णतः विदेशी स्वामित्व वाली रक्षा विनिर्माण इकाई है। यह इकाई भारतीय सशस्त्र बलों और निर्यात बाजारों, दोनों के लिए कार्ल गुस्ताफ एम4 प्रक्षेपक तैयार करेगी।
कार्ल गुस्ताफ एम4 का शामिल किया जाना भारतीय सेना के पैदल सेना हथियारों के आधुनिकीकरण और युद्धक्षेत्र में प्रभावशीलता बढ़ाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कम वजन, अधिक बहुउपयोगिता, उन्नत गोला-बारूद विकल्प और हर मौसम में संचालन क्षमता के साथ यह नया प्रक्षेपक बख्तरबंद खतरों से निपटने और पैदल सेना अभियानों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगा।