उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आग्रह किया कि प्रशिक्षण के दौरान विकलांगता का शिकार होकर बाहर किए गए सैन्य कैडेटों को “पूर्व-सैनिक कर्मी” के लिए निर्धारित कोटे के तहत आरक्षण देने पर विचार करें। अदालत ने कहा कि इससे आरक्षित श्रेणी में उनके रोजगार की संभावनाएँ बेहतर होंगी।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ इस स्वत: संज्ञान रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसका शीर्षक In Re: Cadets Disabled in Military Training Struggle (एसएमडब्ल्यूपी(C) संख्या 6/2025) है। पीठ ने केंद्र सरकार को ऐसे कैडेटों के लिए उपयुक्त कल्याणकारी योजना बनाने का भी निर्देश दिया, विशेषकर उन मामलों में जहाँ उनकी मानक विकलांगता 40 प्रतिशत से कम है और जिन्हें दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 का पूरा लाभ नहीं मिल सकता। केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन से इस संबंध में आवश्यक निर्देश लेने को कहा गया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 40 प्रतिशत या उससे अधिक की मानक विकलांगता वाले बाहर किए गए कैडेट दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 34 के लाभ के हकदार हैं। इस प्रावधान के तहत प्रत्येक उपयुक्त सरकार को प्रत्येक वर्ग के पदों की संवर्ग शक्ति में रिक्तियों के कुल संख्या का कम से कम 4 प्रतिशत हिस्सा मानक विकलांगता वाले व्यक्तियों के लिए आरक्षित करना होता है। पीठ ने कहा कि ऐसे कैडेटों को भी इस प्रावधान का लाभ मिलना चाहिए और वे उसी के अनुसार रोजगार के लिए आवेदन कर सकते हैं।
अदालत के प्रमुख निर्देश और टिप्पणियाँ
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधान हर मामले में बाहर किए गए कैडेटों पर लागू नहीं हो सकते, खासकर उन मामलों में जहाँ विकलांगता 40 प्रतिशत के मानक से कम है। आदेश में कहा गया, “इसलिए, जिन कैडेटों को फिर भी बाहर किया गया है और जिन पर यह अधिनियम लागू नहीं होता, उनके लिए एक उपयुक्त योजना तैयार कर उन्हें लाभ दिया जाना चाहिए।” अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल वेंकटरमन ने इस पहलू पर निर्देश लेने की बात कही।
अदालत ने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सराहना की जिन्होंने रोजगार के उद्देश्य से बाहर किए गए कैडेटों को पहले ही ‘पूर्व सैनिकों’ की श्रेणी में माना है। पीठ ने शेष राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आग्रह किया कि वे उन्हें “पूर्व-सैनिक कर्मी” कोटे में शामिल करने की संभावना पर विचार करें, ताकि आरक्षित श्रेणी में नौकरी पाने की उनकी संभावना बढ़ सके।
नामकरण के संवेदनशील मुद्दे पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने मौखिक रूप से कहा कि प्रशिक्षण के दौरान चोट लगने के कारण जिन्हें कमीशन नहीं मिल सका, और उन अधिकारियों के बीच अंतर होना चाहिए जिन्होंने प्रशिक्षण पूरा कर बलों में प्रवेश किया। उन्होंने कहा, “यह मत सोचिए कि आपको हर काम के लिए सीधे पूर्व सैनिक कहा जाएगा। आपको ढीले तौर पर पूर्व सैनिक कहा जा सकता है, लेकिन साथ ही कुछ अंतर तो होना चाहिए, है न?” उन्होंने प्रभावित कैडेटों को लाभों के “यथार्थवादी विस्तार” की बात कही और संकेत दिया कि अदालत पूर्ण “पूर्व सैनिक” दर्जा दिए बिना भी उपयुक्त लाभों पर विचार करेगी।
पीठ ने इन युवा कैडेटों और उनके परिवारों की गहरी निराशा का भी संज्ञान लिया। कई कैडेटों ने कठोर प्रवेश परीक्षाएँ पास कर देश सेवा की उच्च अपेक्षाओं के साथ प्रमुख प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश किया था, लेकिन प्रशिक्षण के दौरान दुर्घटनाओं के कारण उनका करियर बीच में ही समाप्त हो गया, और यह दुर्घटनाएँ उनकी ओर से किसी लापरवाही के कारण नहीं थीं।
स्वत: संज्ञान मामले की पृष्ठभूमि
उच्चतम न्यायालय ने अगस्त 2025 में मीडिया रिपोर्टों, विशेषकर The Indian Express की खोजी रिपोर्टों के आधार पर स्वत: संज्ञान लिया था। इन रिपोर्टों में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, भारतीय सैन्य अकादमी, अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी, वायु सेना अकादमी और भारतीय नौसेना अकादमी जैसे संस्थानों से प्रशिक्षण के दौरान हुई विकलांगता के कारण चिकित्सकीय रूप से बाहर किए गए अधिकारी कैडेटों की गंभीर कठिनाइयों को उजागर किया गया था।
इन कैडेटों को पहले न तो कमीशन प्राप्त अधिकारियों के पूर्ण लाभ मिलते थे और न ही विकलांगता झेलने वाले कुछ अन्य रैंकों के समान सुविधाएँ। उन्हें आम तौर पर केवल सीमित अनुग्रह राशि मिलती थी, चिकित्सा खर्च बढ़ते रहते थे और पूर्व सैनिक के रूप में औपचारिक मान्यता भी नहीं मिलती थी। इसके चलते उन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण, पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना के तहत व्यापक स्वास्थ्य सेवा और पुनर्वास से जुड़ी अन्य व्यवस्थाओं से वंचित रहना पड़ता था।
वर्षों में ऐसे प्रभावित कैडेटों की कुल संख्या कुछ सौ से लेकर लगभग 2,000-2,500 तक बताई गई है, जबकि हर वर्ष सभी अकादमियों से लगभग 40-50 कैडेट बाहर किए जाते हैं। इनमें अधिकांश 20 और 30 की आयु वर्ग में हैं, इसलिए उनके लिए रोजगार और पुनर्वास विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता रेखा पल्ली ने पूरी कार्यवाही में अदालत की सहायता की है और उन्होंने जोर देकर कहा है कि उचित समर्थन मिलने पर इन कैडेटों का बड़ा हिस्सा पुनर्वासित किया जा सकता है।
अदालत की सतत निगरानी से पहले ही उल्लेखनीय प्रगति हुई है। पूर्व निर्देशों के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने 29 अगस्त 2025 से अमान्य घोषित और बाहर किए गए कैडेटों को पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना के लाभ दिए, जिससे उनकी आजीवन चिकित्सा आवश्यकताएँ कवर हुईं और एकमुश्त अंशदान शुल्क भी माफ कर दिया गया। अदालत अब मासिक अनुग्रह राशि बढ़ाने, समूह बीमा की संभावना, सुधार की स्थिति में उपयुक्त कार्यालयी या वैकल्पिक भूमिकाओं में पुनर्वास, और 2015 की सभरवाल समिति की सिफारिशों पर पुनर्विचार भी देख रही है।
गठित 8वाँ केंद्रीय वेतन आयोग अनुग्रह राशि बढ़ाने पर विचार करेगा। अदालत ने प्रभावित व्यक्तियों को आयोग के समक्ष अभ्यावेदन देने की छूट दी और आशा व्यक्त की कि आयोग, जिसकी अध्यक्षता अब एक पूर्व महिला न्यायाधीश कर रही हैं, मामले को आवश्यक संवेदनशीलता के साथ देखेगा।
आगे की दिशा
अदालत के ताज़ा निर्देश उन युवा अभ्यर्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं, जिन्होंने देश की सेवा की तैयारी के दौरान जीवन बदल देने वाली चोटें झेली हैं। राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों से “पूर्व-सैनिक कर्मी” कोटा खोलने का आग्रह और दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम के तहत 4 प्रतिशत आरक्षण के लाभ की पुष्टि करके अदालत ने आजीविका के व्यावहारिक रास्ते बनाने की कोशिश की है।
केंद्र को उन लोगों को शामिल करते हुए एक व्यापक योजना तैयार करने को कहा गया है जो अधिनियम की सख्त शर्तों से बाहर हैं। यह मामला अब 8 सितंबर 2026 को फिर से सुना जा सकता है।
यह प्रकरण इस बात को रेखांकित करता है कि कठोर सैन्य प्रशिक्षण में अंतर्निहित जोखिम होते हैं और इस प्रक्रिया में घायल होने वालों को पर्याप्त संस्थागत सहायता, मान्यता और सम्मानजनक जीवन के अवसरों से वंचित नहीं छोड़ा जाना चाहिए।