नई दिल्ली/देहरादून, 22 सितंबर 2026 — भारतीय वायु सेना के एक जगुआर लड़ाकू विमान के कम ऊंचाई वाले प्रशिक्षण उड़ान के दौरान दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना के करीब 15 साल बाद, सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) ने उस समय के फ्लाइट कमांडर पर लगाए गए निंदा-दंड को बरकरार रखा है। यह कार्रवाई नए तैनात पायलट को उड़ान के लिए तैयार करने में हुई पर्यवेक्षण संबंधी चूक को लेकर की गई थी।
न्यायाधिकरण की एक पीठ, जिसमें एक न्यायिक सदस्य और एक प्रशासनिक सदस्य शामिल थे, ने 14 सितंबर के आदेश में विंग कमांडर की याचिका खारिज कर दी। इसमें छह महीने के “कठोर असंतोष” दंड को चुनौती दी गई थी। पीठ ने माना कि अधिकारी ने फ्लाइट लेफ्टिनेंट को सभी अनिवार्य पूर्व-उड़ान आवश्यकताएं पूरी किए बिना ही उड़ान के लिए नियोजित कर दिया था।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि न्यायाधिकरण ने विंग कमांडर को दुर्घटना का प्रत्यक्ष कारण नहीं माना। उसका निष्कर्ष केवल नए रिपोर्टिंग पायलट की योजना और तैयारी में पर्यवेक्षणीय विफलता तक सीमित था।
4 अगस्त 2011 को जगुआर JS-197, एयर फोर्स स्टेशन गोरखपुर से उड़ान भरने के बाद कम ऊंचाई वाले प्रशिक्षण मिशन के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। विमान उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के मधुबन थाना क्षेत्र में ढिलाई फिरोजपुर गांव के पास गिरा था।
इस दुर्घटना में स्क्वाड्रन में केवल चार दिन पहले शामिल हुए फ्लाइट लेफ्टिनेंट की मौत हो गई थी। पास के खेतों में काम कर रही 18 वर्षीय एक युवती की भी मलबे की चपेट में आने से मृत्यु हो गई थी।
जांच न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि दुर्घटना का सबसे संभावित कारण नियंत्रित उड़ान का भूभाग से टकराना था, जो अनजाने में हुई ऐसी ऊंचाई-घटाव से जुड़ा था जिसे पायलट पर्याप्त समय रहते पहचान नहीं सका।
रखरखाव अभिलेख, विमान आंकड़ा रिकॉर्डर से प्राप्त सामग्री और बीएई सिस्टम्स की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि 1 अगस्त को दर्ज डिफरेंशियल टेल प्लेन की खराबी की जांच कर उसे ठीक कर दिया गया था, और बाद में विमान को उड़ान के लिए सेवा योग्य प्रमाणित किया गया था।
फ्लाइट लेफ्टिनेंट 31 जुलाई 2011 को एयर फोर्स स्टेशन गोरखपुर स्थित स्क्वाड्रन में आया था। फ्लाइट कमांडर के रूप में विंग कमांडर, कमांडिंग ऑफिसर के परामर्श से उड़ान कार्यक्रम तैयार करने के लिए जिम्मेदार था।
उसने नए आए पायलट को उड़ान शुरू करने से पहले आगमन औपचारिकताएं, सिम्युलेटर उड़ान, सामान्य परीक्षण और स्थानीय आदेशों तथा प्रक्रियाओं की जानकारी पूरी करने का निर्देश दिया था।
1 अगस्त को सिम्युलेटर अनुपयोगी था। इसके बावजूद, 2 अगस्त के लिए फ्लाइट लेफ्टिनेंट को उड़ान के लिए नियोजित किया गया, हालांकि वह मिशन अंततः हुआ नहीं।
3 अगस्त को पायलट ने दो उड़ानें भरीं, जिनमें कमांडिंग ऑफिसर के साथ दोहरी जांच वाली उड़ान के बाद एक एकल उड़ान शामिल थी। घातक उड़ान अगले दिन हुई।
विंग कमांडर 3 अगस्त से अपनी बेटी की चिकित्सकीय आपात स्थिति के कारण स्वीकृत अवकाश पर चला गया था। उसका कहना था कि बाद की उड़ानें, जिनमें घातक उड़ान भी शामिल है, अन्य अधिकारियों द्वारा अधिकृत की गई थीं और स्टेशन छोड़ने के बाद हुई घटनाओं के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
पीठ ने जांच न्यायालय के समक्ष विंग कमांडर के अपने ही बयान पर भरोसा किया, जिसमें उसने कहा था कि नया रिपोर्टिंग पायलट सामान्यतः लगभग एक सप्ताह बाद ही उड़ान शुरू करता है।
पीठ ने कहा कि चूक का संबंध फ्लाइट लेफ्टिनेंट को सभी आवश्यक पूर्व-उड़ान गतिविधियां पूरी होने से पहले ही उड़ान के लिए नियोजित करने से था। न्यायाधिकरण के अनुसार, पर्यवेक्षणीय जिम्मेदारी किसी विशेष उड़ान की अंतिम अनुमति से पहले ही शुरू हो जाती है।
न्यायाधिकरण ने अवकाश संबंधी दलील को भी खारिज करते हुए कहा कि 3 अगस्त से शुरू हुआ उसका अवकाश 2 अगस्त तक मौजूद जिम्मेदारियों से उसे मुक्त नहीं करता।
पीठ ने यह भी माना कि विंग कमांडर ने कमांडिंग ऑफिसर और कार्यवाहक फ्लाइट कमांडर को यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया था कि जब तक सभी अनिवार्य पूर्व-उड़ान गतिविधियां पूरी न हो जाएं और नया तैनात पायलट उड़ान के लिए तैयार न हो, तब तक किसी भी मिशन की योजना नहीं बनाई जानी चाहिए।
दूसरी जांच एक गुमनाम शिकायत के बाद शुरू हुई थी, जिसमें उड़ान-सुरक्षा उल्लंघनों, विमान की खराबियों को छिपाने और अभिलेखों में हेरफेर का आरोप लगाया गया था।
न्यायाधिकरण ने तकनीकी खराबी के आरोप को निंदा-दंड हटाने का आधार नहीं माना। उसने कहा कि विंग कमांडर की जिम्मेदारी नए तैनात पायलट की तैयारी में हुई पर्यवेक्षणीय चूक से उत्पन्न हुई थी, न कि इस निष्कर्ष से कि उसकी किसी कार्रवाई ने सीधे विमान को दुर्घटनाग्रस्त किया था।
अधिकारी ने पक्षपात, चुनिंदा कार्रवाई, गवाहों से पर्याप्त जिरह का अवसर न मिलने और जांचों तथा प्रतिकूल वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों के बीच संबंध का भी आरोप लगाया। उसका कहना था कि इन्हीं रिपोर्टों के कारण उसे 2014, 2015 और 2016 में ग्रुप कैप्टन पद पर पदोन्नति नहीं मिली।
भारत सरकार ने उत्पीड़न के आरोपों से इनकार किया और कहा कि अधिकारी की पुनर्विचार याचिका पर वायु सेना प्रमुख ने विचार किया था तथा 8 फरवरी 2016 के कारणयुक्त आदेश से उसे खारिज कर दिया गया था।
पीठ ने “कठोर असंतोष” के छह महीने के दंड में कोई त्रुटि नहीं पाई और अन्य अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के लिए स्वतंत्र जांच का आदेश देने से भी इनकार कर दिया।
न्यायाधिकरण ने केवल इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या निंदा-दंड का जांच अभिलेखों में कोई टिकाऊ आधार था, और याचिका को निराधार मानकर खारिज कर दिया। पदोन्नति और वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट से जुड़ी प्रार्थनाएं भी निरर्थक हो गईं, क्योंकि विंग कमांडर ने 31 अगस्त 2017 को समयपूर्व सेवानिवृत्ति ले ली थी।
यह फैसला इस दृष्टि को रेखांकित करता है कि नए तैनात पायलट के लिए फ्लाइट कमांडर की पर्यवेक्षणीय जिम्मेदारी योजना और तैयारी के चरण से ही शुरू हो जाती है, और यह किसी एक मिशन की अंतिम अनुमति तक सीमित नहीं रहती।
साथ ही, यह निर्णय पर्यवेक्षणीय चूक और विमान दुर्घटना के प्रत्यक्ष कारण के बीच स्पष्ट अंतर भी दर्शाता है। इस मामले में दुर्घटना का सबसे संभावित कारण नियंत्रित उड़ान का भूभाग से टकराना दर्ज किया गया था।
जगुआर, जिसे 1970 के दशक के अंत में भारतीय वायु सेना में शामिल किया गया था, चार दशकों से अधिक समय तक परिचालन सेवा में बना रहा है। अगस्त 2011 की यह दुर्घटना उन हादसों में से एक थी, जिनमें यह विमान प्रशिक्षण और परिचालन उड़ानों के दौरान खोया गया।
14 सितंबर का यह आदेश घातक जगुआर दुर्घटना के बाद गठित जांचों और उसके बाद आई गुमनाम शिकायत से जुड़े विंग कमांडर के लंबे समय से चले आ रहे चुनौतीपूर्ण मामले को समाप्त करता है।