मणिपुर में आतंकवाद-रोधी अभियान के दौरान अपने बेटे के शहीद होने के 22 साल बाद, शौर्य चक्र से सम्मानित सहायक कमांडेंट विवेक सक्सेना की 80 वर्षीय मां ने उनके नाम पर दिए गए वीरता पदक और आर्थिक सम्मान वापस करने की पेशकश की है। लखनऊ में आयोजित एक जन-शिकायत शिविर में की गई यह पेशकश परिवार की उस थकान को दर्शाती है, जो जमीन और स्मारक को लेकर दो दशक से मिले न पूरे हुए सरकारी आश्वासनों के बाद सामने आई है।
सवित्री सक्सेना अपने बड़े बेटे रंजीत सक्सेना के साथ शनिवार, 6 सितंबर को सरोजिनी नगर तहसील में आयोजित सम्पूर्ण समाधान दिवस में पहुंचीं। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि यदि शहीद परिवार को अब भी जमीन का एक टुकड़ा पाने के लिए अपमान झेलना पड़े, तो राज्य शौर्य चक्र, राष्ट्रपति पुलिस पदक फॉर गैलेंट्री और उससे जुड़ी सम्मान राशि वापस ले ले। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिलने का अनुरोध किया है।
विवेक सक्सेना सीमा सुरक्षा बल की 2वीं बटालियन में थे और 8 जनवरी 2003 को मणिपुर के साजिक ताम्पाक के पास एक संयुक्त अभियान के दौरान शहीद हो गए। उनका जन्म 20 दिसंबर 1973 को हुआ था और उन्होंने 6 मार्च 2000 को सीमा सुरक्षा बल जॉइन किया था। आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार, ऊंची स्थितियों पर कब्जा जमाए भूमिगत उग्रवादियों की भारी गोलीबारी के बीच उन्हें गोली लगी और उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। भारत सरकार ने बाद में उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र और राष्ट्रपति का वीरता पदक प्रदान किया। उनके निकटतम परिजन क्रिश्नालोक-1, बंथरा, लखनऊ में दर्ज थे।
परिवार के अनुसार, उनकी मृत्यु के बाद प्रशासन ने ग्रामीण कोटे के तहत जमीन और एक स्मारक पार्क देने का वादा किया था। वर्ष 2016 में तत्कालीन लखनऊ जिलाधिकारी राज शेखर ने इस मामले का संज्ञान लिया, विभिन्न विभागों में आवेदन स्वीकार किए और अपर जिलाधिकारी को 15 दिनों के भीतर जांच पूरी कर आवंटन तथा स्मरण-कार्यवाही शुरू करने के निर्देश दिए। लेकिन इन निर्देशों से भी कोई अंतिम समाधान नहीं निकल सका।
बाद में मामला निवास-स्थान से जुड़े सवालों पर अटक गया। अधिकारियों ने परिवार से यह साबित करने को कहा कि वे उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हैं और यह शपथपत्र मांगा कि सवित्री सक्सेना की शादी से पहले उनका निवास कहां था। रंजीत सक्सेना ने कहा कि परिवार उत्तर प्रदेश में ही पला-बढ़ा और पढ़ा है तथा उनके भाई की एक स्मृति-चिह्न सामग्री एयर फोर्स स्टेशन मेमोरा में स्थापित है। उन्होंने एक पुरानी रसीद भी प्रस्तुत की, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उसी पते पर 75,000 रुपये का चेक जारी किए जाने का उल्लेख था।
देरी केवल जमीन तक सीमित नहीं रही। शौर्य चक्र से जुड़ी आर्थिक राशि परिवार को 2024 में जाकर मिली, जो प्रशस्ति के दो दशक से अधिक समय बाद थी। परिजनों का आरोप है कि सत्यापन बार-बार टलने से फाइल महीनों तक एक मेज से दूसरी मेज तक घूमती रही। तहसील शिविर में परिवार ने उपेक्षापूर्ण व्यवहार का आरोप भी लगाया, जिसमें यह टिप्पणी शामिल थी कि वे वर्षों की तरह इंतजार करते रहेंगे।
सवित्री सक्सेना ने कहा कि 80 वर्ष की आयु में अब उनके पास सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की ताकत नहीं बची है। उन्होंने कहा, यदि बेटे की शहादत के बाद भी जमीन के लिए अपमान सहना पड़े, तो सरकार शौर्य चक्र, पदक और सम्मान राशि वापस ले ले। यह बात सुनवाई के विवरण के अनुसार कही गई।
उप-जिलाधिकारी अभिषेक कुमार सिंह ने अधिकारियों को शिकायतों की जांच कर एक सप्ताह के भीतर समाधान की दिशा में काम करने के निर्देश दिए हैं। अब यह देखना बाकी है कि क्या यह निर्देश दो दशक से अधिक समय से चल रही फाइलों, शपथपत्रों और आश्वासनों के इस मामले को समाप्त कर पाएगा। परिवार की मांग अब केवल जमीन की नहीं रह गई है। वह यह भी चाहती है कि राज्य तय करे कि क्या वीरता पुरस्कार का अर्थ तब भी बना रहता है, जब उसे अर्जित करने वाले व्यक्ति की मां से ही बार-बार अपने होने का प्रमाण मांगा जाए।