सैन्य महाविद्यालय, इलेक्ट्रॉनिक्स और यांत्रिक अभियांत्रिकी के कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल नीरज वशिष्ठ ने सैन्य प्रौद्योगिकी संस्थान, मिलिट में आधुनिक सैन्य रसद पर उभरती प्रौद्योगिकियों के बढ़ते प्रभाव पर एक विचारपूर्ण संबोधन दिया।
डीएसटीएससी-09 के प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल वशिष्ठ ने “संचालनात्मक रसद पर उभरती प्रौद्योगिकी का प्रभाव” विषय पर बात की। उन्होंने बताया कि तकनीकी प्रगति किस तरह सशस्त्र बलों की योजना, प्रबंधन और अभियानों को बनाए रखने की पद्धति को बदल रही है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि उभरती प्रौद्योगिकियां संचालनात्मक फुर्ती और सहनशीलता को लगातार बढ़ा रही हैं। चर्चा में एआई-आधारित पूर्वानुमान, पूर्वानुमेय रखरखाव, कुशल आपूर्ति-श्रृंखला प्रबंधन, स्वायत्त प्रणालियां, वास्तविक समय के युद्धक्षेत्र की दृश्यता और महत्वपूर्ण संसाधनों के बेहतर प्रबंधन जैसे क्षेत्र प्रमुख रहे।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा-आधारित प्रणालियां सैन्य योजनाकारों को रसद आवश्यकताओं का अधिक सटीक अनुमान लगाने, संसाधनों के आवंटन को बेहतर करने और कठिन परिस्थितियों में तैनात बलों तक आपूर्ति तथा उपकरणों की पहुंच की गति बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।
पूर्वानुमेय रखरखाव भी एक ऐसा महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहां उभरती प्रौद्योगिकी पारंपरिक सैन्य रसद को बदल रही है। उपकरणों में संभावित खराबी होने से पहले उनकी पहचान कर यह तकनीक प्लेटफॉर्म की उपलब्धता बढ़ाने और संचालनात्मक निष्क्रियता कम करने में सहायक हो सकती है।
लेफ्टिनेंट जनरल वशिष्ठ ने प्रतिस्पर्धी वातावरण में बलों को बनाए रखने के महत्व पर भी प्रकाश डाला। ऐसे हालात में पारंपरिक आपूर्ति-श्रृंखलाएं बाधित हो सकती हैं और कमांडरों को बदलती युद्धभूमि परिस्थितियों के आधार पर त्वरित निर्णय लेने पड़ सकते हैं।
स्वायत्त प्रणालियां, बेहतर युद्धक्षेत्र दृश्यता और बुद्धिमान रसद नेटवर्क अब कमांडरों को अधिक स्थिति-जागरूकता देने में सक्षम हो रहे हैं। इससे पूरी रसद श्रृंखला अधिक तेज, अधिक उत्तरदायी और अधिक सहनशील बन रही है।
सत्र में इस मूल सत्य को भी रेखांकित किया गया कि युद्ध कभी एक जैसे नहीं होते। संघर्ष का स्वरूप बदलने के साथ सैन्य रसद को भी उसी तरह अनुकूलनीय रहना होगा और विभिन्न संचालनात्मक आवश्यकताओं के अनुसार खुद को ढालना होगा।
मिलिट में हुई यह चर्चा इस बात को दर्शाती है कि सशस्त्र बल उभरती प्रौद्योगिकियों के उपयोग पर लगातार जोर दे रहे हैं, ताकि संचालनात्मक तैयारी को मजबूत किया जा सके और भविष्य के युद्धक्षेत्रों के लिए उपयुक्त रसद प्रणालियां विकसित की जा सकें।