चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि, पीवीएसएम, एवीएसएम, एसएम, वीएसएम ने नई दिल्ली स्थित तटरक्षक मुख्यालय में आयोजित 43वीं तटरक्षक कमांडर्स’ कॉन्फ्रेंस में भारतीय तटरक्षक बल के शीर्ष नेतृत्व को संबोधित किया। उन्होंने भविष्य के लिए तैयार और प्रौद्योगिकी से सक्षम समुद्री सुरक्षा बल के निर्माण से जुड़ी प्रमुख प्राथमिकताओं को सामने रखा।
अपने संबोधन में सीडीएस ने तटरक्षक बल की समग्र परिचालन तैयारियों को मजबूत करने के लिए अधिक संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और नवाचार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित उभरती प्रौद्योगिकियों के तेज विकास और उनके परिचालन एकीकरण की बात कही।
जनरल एनएस राजा सुब्रमणि ने कहा कि भारत अपनी समुद्री सुरक्षा संरचना को मजबूत कर रहा है, ऐसे में सेवाओं के बीच निर्बाध परिचालन समन्वय बहुत महत्वपूर्ण है। अधिक संयुक्तता से रक्षा तंत्र के अलग-अलग हिस्से क्षमताओं और संसाधनों का अधिक प्रभावी ढंग से समन्वय कर सकते हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को क्षमता विकास के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया गया। यह आधुनिक सैन्य और समुद्री अभियानों में प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है, जहां सूचना का तेज प्रसंस्करण, बेहतर स्थिति-समझ और प्रौद्योगिकी-सक्षम निर्णय लेने की क्षमता से अभियान की प्रभावशीलता बढ़ सकती है।
सीडीएस ने यह भी कहा कि उभरती प्रौद्योगिकियों को अलग-थलग गतिविधि मानने के बजाय उन्हें परिचालन ढांचे में शामिल करना जरूरी है। नई क्षमताओं को मौजूदा संरचनाओं से जोड़ना और कार्मिकों को उनके प्रभावी उपयोग के लिए प्रशिक्षित करना तकनीकी प्रगति को व्यावहारिक सैन्य क्षमता में बदलने के लिए आवश्यक रहेगा।
सम्मेलन में आत्मनिर्भरता पर भी विशेष बल दिया गया। जनरल एनएस राजा सुब्रमणि ने प्रौद्योगिकी आधारित स्वदेशी क्षमता विकास के लिए निरंतर प्रयासों का आह्वान किया, ताकि देश के भीतर महत्वपूर्ण प्रणालियों को डिजाइन करने, विकसित करने और बनाए रखने की क्षमता मजबूत हो सके।
आत्मनिर्भरता को मजबूत आपूर्ति शृंखलाओं की आवश्यकता से भी जोड़ा गया। आवश्यक उपकरणों, घटकों और सहायता प्रणालियों तक विश्वसनीय पहुंच सतत परिचालन तैयारियों का अहम हिस्सा है, खासकर उस तटरक्षक बल के लिए जो भारत के विस्तृत समुद्री क्षेत्रों में लगातार कार्य करता है।
मजबूत आपूर्ति शृंखलाएं बाहरी स्रोतों से होने वाले व्यवधानों के कारण पैदा होने वाली कमजोरियों को कम कर सकती हैं। साथ ही, स्वदेशी विनिर्माण और घरेलू औद्योगिक क्षमताओं को बढ़ावा देकर तटरक्षक बल की दीर्घकालिक परिचालन जरूरतों और समुद्री सुरक्षा को भी सहारा मिल सकता है।
43वीं तटरक्षक कमांडर्स’ कॉन्फ्रेंस वरिष्ठ नेतृत्व के लिए क्षमता विकास और परिचालन तैयारियों से जुड़ी प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श का मंच बनी। सीडीएस की मौजूदगी ने संयुक्तता और सशस्त्र बलों के बीच अधिक एकीकरण पर अतिरिक्त ध्यान केंद्रित किया।
भारतीय तटरक्षक बल देश की समुद्री सुरक्षा संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसके दायित्व देश के समुद्री हितों तक फैले हुए हैं। प्रौद्योगिकी, नवाचार और अधिक एकीकरण के जरिए इसकी क्षमताओं को मजबूत करना भारत के समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा के व्यापक लक्ष्य से सीधे जुड़ा है।
सम्मेलन में बदलते परिचालन परिवेश के लिए तटरक्षक बल को तैयार करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। जैसे-जैसे समुद्री सुरक्षा चुनौतियां अधिक प्रौद्योगिकी-आधारित होती जा रही हैं, मानवीय विशेषज्ञता और उन्नत प्रौद्योगिकियों का संयोजन परिचालन प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए केंद्रीय होगा।
सीडीएस के नवाचार पर जोर ने क्षमता विकास और परिचालन समस्याओं के समाधान के लिए नए तरीकों को प्रोत्साहित करने की जरूरत को भी रेखांकित किया। प्रौद्योगिकी अपनाने, स्वदेशी विकास और संस्थागत नवाचार के मेल से एक अधिक अनुकूलनीय समुद्री बल तैयार किया जा सकता है।
संयुक्तता पर दिया गया ध्यान रक्षा तंत्र में तीनों सेवाओं और अन्य समुद्री सुरक्षा हितधारकों के बीच अधिक एकीकरण की व्यापक प्रक्रिया से भी मेल खाता है। तटरक्षक बल के लिए निकट परिचालन समन्वय से बहु-एजेंसी और सैन्य संरचनाओं से जुड़े अभियानों में बेहतर तालमेल संभव हो सकता है।
यह संबोधन समुद्री सुरक्षा के लिए भविष्य-केंद्रित दृष्टिकोण की पुष्टि करता है, जिसमें परिचालन तत्परता, प्रौद्योगिकीय उन्नयन और आत्मनिर्भरता का संयोजन शामिल है। इन क्षेत्रों में तटरक्षक बल के निरंतर प्रयास भारत के समुद्री हितों की रक्षा क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से जुड़े हैं।
इस प्रकार 43वीं तटरक्षक कमांडर्स’ कॉन्फ्रेंस में संयुक्तता, आत्मनिर्भरता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवाचार और मजबूत आपूर्ति शृंखलाओं को भविष्य की क्षमता विकास चर्चाओं के केंद्र में रखा गया। ये प्राथमिकताएं एकीकृत समुद्री अभियानों को मजबूत करने और विकसित भारत 2047 की दिशा में प्रौद्योगिकी-समर्थ और आत्मनिर्भर रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में योगदान देने के लिए तय की गई हैं।