नई दिल्ली, 5 अक्टूबर 2026: दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक सेना के जवान को नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया है। उस पर आरोप है कि वह कथित रूप से गोपनीय सैन्य दस्तावेज पाकिस्तान उच्चायोग के एक अधिकारी तक पहुंचाने का माध्यम बना।
न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने 25 सितंबर के आदेश में कहा कि सामग्री की प्रकृति, उसके बताए गए स्रोत और उसके कथित गंतव्य का महत्व उस अवधि से अधिक है, जो आरोपी पहले से हिरासत में बिता चुका है। अदालत ने मामले की सुनवाई तेजी से पूरी करने का निर्देश भी दिया।
आरोपी को दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने जुलाई 2021 में गिरफ्तार किया था। अभियोजन का आरोप है कि उसे एक सह-आरोपी से गुप्त सैन्य दस्तावेज मिले और उसने उन्हें पाकिस्तान उच्चायोग के एक अधिकारी को सौंप दिया। उसके पास से मिली प्रतियों को सैन्य प्रशिक्षण, सशस्त्र बल विशेष संचालन प्रभाग के क्रियान्वयन और गोपनीय सैन्य खुफिया सारांशों से संबंधित बताया गया है। भारतीय सेना ने इन दस्तावेजों को प्रामाणिक, गोपनीय और संवेदनशील बताया है।
यह मामला आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 के तहत दर्ज है। इस अधिनियम की सबसे गंभीर धाराओं में 14 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। सार्वजनिक रिपोर्टिंग में आरोपी का नाम नहीं बताया गया है।
रक्षा पक्ष और अभियोजन
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वी. मधुकर ने दलील दी कि आरोप की गंभीरता अपने आप जमानत के सामान्य सिद्धांतों को समाप्त नहीं करती। उन्होंने कहा कि अदालत को आरोपी की भूमिका, उसके खिलाफ उपलब्ध सामग्री, हिरासत की अवधि और मुकदमे की प्रगति पर विचार करना चाहिए।
याचिकाकर्ता तीन वर्ष और चार महीने से अधिक की वास्तविक हिरासत भुगत चुका है। जांच पूरी हो चुकी है और जिस साक्ष्य पर भरोसा किया गया है, वह मुख्यतः दस्तावेजी है तथा पहले से अभियोजन या अदालत के पास है। पूर्व अंतरिम जमानत के दौरान उसके अच्छे आचरण का भी उल्लेख किया गया।
अतिरिक्त लोक अभियोजक युधवीर सिंह चौहान ने याचिका का विरोध किया। राज्य ने गोपनीय दस्तावेजों की बरामदगी और सेना द्वारा उनकी पुष्टि पर भरोसा किया। अदालत ने दर्ज किया कि मामला केवल बिना पुष्टि वाले आरोप या सह-आरोपी के बयान पर आधारित नहीं है।
अदालत ने प्राथमिक सामग्री का भी उल्लेख किया, जो कथित रूप से आरोपी को दस्तावेजों की आगे की श्रृंखला से जोड़ती है। इसमें फोन रिकॉर्ड, सिम कार्ड विवरण, वित्तीय लेन-देन और उसके कर्मचारी का बयान शामिल है।
चिकित्सीय आधार खारिज
आरोपी ने चिकित्सीय आधार पर भी जमानत मांगी थी। उसने व्हीलचेयर पर निर्भरता और अन्य बीमारियों का हवाला दिया। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के नौ सदस्यीय चिकित्सा बोर्ड ने उसकी जांच की और उसके बताए गए चिकित्सा इतिहास तथा वास्तविक निष्कर्षों में महत्वपूर्ण अंतर दर्ज किया।
अदालत ने माना कि उसकी वास्तविक चिकित्सीय समस्याएं हैं, लेकिन कहा कि रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया है कि जरूरी उपचार हिरासत में नहीं दिया जा सकता या निरंतर हिरासत चिकित्सकीय रूप से असंभव है।
अदालत का तर्क
न्यायमूर्ति नरूला ने कहा कि केवल आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम का हवाला देना या 14 वर्ष की सजा की संभावना, अपने आप जमानत को रोक नहीं देती। आदेश में कहा गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा आरोप गहन जांच की मांग करता है, लेकिन वह मामले को अदालत के जमानत क्षेत्राधिकार से बाहर नहीं कर देता।
साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि यह मामला सामान्य जमानत प्रकरण की तरह नहीं देखा जा सकता। अदालत के अनुसार इस मामले की गंभीरता केवल विधिक प्रावधान में नहीं, बल्कि दस्तावेजों की प्रकृति, उनके बताए गए स्रोत और उनके कथित गंतव्य में है।
अदालत ने कहा कि हिरासत की अवधि और अंतरिम जमानत पर आचरण याचिकाकर्ता के पक्ष में हैं, लेकिन इस स्तर पर वे आरोपों की गंभीरता को कम करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए जमानत खारिज कर दी गई और सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया गया।
अदालत का यह आदेश जमानत से इनकार है, दोषसिद्धि नहीं। आरोपों की सच्चाई का परीक्षण मुकदमे में किया जाएगा।