भारतीय सेना ने जालंधर स्थित 11 कोर (वज्र कोर) के तहत अपनी पहली समर्पित ‘बाज बटालियन’ खड़ी की है, जो पाकिस्तान के साथ पश्चिमी मोर्चे पर विशेष रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट और मानवरहित प्रणालियों के संचालन के लिए बनाई गई है। जालंधर में स्थापित यह इकाई सेना के ऑपरेशन सिंदूर के बाद चल रहे परिवर्तन का एक बड़ा संगठनात्मक कदम मानी जा रही है।
‘बाज’ नाम बाज पक्षी से लिया गया है, जो तीक्ष्ण दृष्टि, दूर तक निगरानी और सटीक लक्ष्यभेदन का प्रतीक माना जाता है। इस बटालियन के सूत्रवाक्यों में “नई पंखें। नई क्षमता। निर्णायक बढ़त” और “आकाश में निगाहें। रणभूमि में बढ़त” शामिल हैं। गठन के दौरान वज्र कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग और सभी रैंकों ने बटालियन के कर्मियों को शुभकामनाएं दीं।
रणनीतिक संदर्भ और आवश्यकता
इस पहल की सार्वजनिक रूपरेखा पहली बार जून 2026 के अंत में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सेना की “परिवर्तन के दशक” पहल के तहत पेश की थी। यह मौजूदा रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट उड़ानों पर आधारित है और इसका उद्देश्य ऐसे प्रशिक्षित कर्मियों का एक विशेष समूह तैयार करना है, जो संचालन, रखरखाव, आंकड़ों के उपयोग, सॉफ्टवेयर उन्नयन, प्रशिक्षण मानकीकरण और जमीनी बलों के साथ समन्वय जैसे पूरे दायरे को संभाल सके।
इसके पीछे दो तरह के परिचालन अनुभव निर्णायक रहे। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे समय तक चले तैनाती और गतिरोध ने लगातार, ऊंचाई पर और गहराई तक निगरानी की जरूरत को उजागर किया। वहीं ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखाया कि खुफिया, निगरानी, टोही, लक्ष्य प्राप्ति, दुश्मन वायु रक्षा दमन और सटीक प्रभाव के लिए ड्रोन और मानवरहित प्रणालियों की भूमिका कितनी अहम हो गई है।
सेना के मानवरहित बेड़े के तेज विस्तार ने भी इस आवश्यकता को बढ़ाया है। कुछ ही समय पहले जहां कुछ सौ ड्रोन थे, अब सेना के पास 50,000 से अधिक मानवरहित प्रणालियां हैं। अनुमान है कि यह संख्या दो से तीन साल में दोगुनी हो सकती है। इतनी बड़ी संख्या को संभालने के लिए विशेष जनशक्ति, मानकीकृत प्रक्रिया, तेज पुनःपूर्ति चक्र और डेटा प्रसंस्करण की क्षमता जरूरी है।
बाज बटालियन की भूमिका
सेना की उभरती बहु-स्तरीय मानवरहित संरचना में बाज बटालियन एक अलग परिचालन स्तर पर रखी गई है। यह पदाति बटालियनों में मौजूद अशनि ड्रोन प्लाटूनों, तोपखाने में दिव्यास्त्र बैटरियों और प्रस्तावित शक्तिबाण रेजिमेंटों, तथा कवच कोर में प्रयोगाधीन शौर्य स्क्वाड्रनों से ऊपर की भूमिका निभाएगी।
आर्मी एविएशन कोर के अधीन यह बटालियन लंबे समय तक चलने वाली खुफिया, गहराई तक टोही, लक्ष्य निर्धारण, डेटा के एकीकरण और मिश्रित बेड़ों के बीच समन्वय के लिए एक केंद्रीकृत केंद्र के रूप में काम करेगी। इसका उद्देश्य रणभूमि की निरंतर समझ बनाए रखना, सेंसर से हथियार तक की प्रक्रिया को तेज करना और विवादित सीमाओं पर रक्षात्मक निगरानी के साथ आक्रामक तैयारियों को भी मजबूत करना है।
प्लेटफॉर्म और संचालन क्षमता
बटालियन को पैदल सेना या तोपखाने की उप-इकाइयों को दिए जाने वाले छोटे तंत्रों से अधिक बड़े और लंबे समय तक उड़ान भरने वाले प्लेटफॉर्म संचालित करने के लिए तैयार किया गया है। इनमें सर्चर श्रेणी के यूएवी, मध्यम ऊंचाई वाले दीर्घ-धैर्य मंच, तथा उच्च ऊंचाई वाले दीर्घ-धैर्य तंत्र शामिल हैं।
इसके साथ ही भारतीय निर्मित सामरिक और परिचालन यूएवी भी इसके दायरे में आएंगे। भविष्य के चरणों में डीआरडीओ के घातक स्टील्थ यूसीएवी और अन्य स्वदेशी सशस्त्र या हमलावर प्लेटफॉर्म के एकीकरण की संभावना भी बताई गई है। इन साधनों से सीमा निगरानी, दुश्मन क्षेत्र के भीतर गहराई तक टोही, दुश्मन की तैनाती की वास्तविक समय में निगरानी और अग्रिम पंक्ति के कमांडरों के लिए उपयोगी खुफिया जानकारी तैयार की जा सकेगी।
बाज प्रबंधन के तहत सशस्त्र यूएवी, एफपीवी ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और रसद ड्रोन भी शामिल होंगे। मिश्रित बेड़ों से उत्पन्न भारी मात्रा में डेटा के विश्लेषण और उपयोग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निर्णय-सहायता प्रणालियों की अहम भूमिका रहने की उम्मीद है।
पाकिस्तान मोर्चे और 11 कोर के लिए महत्व
जालंधर मुख्यालय वाली 11 कोर, जिसे पंजाब के रक्षक भी कहा जाता है, उत्तर पंजाब के उन संवेदनशील क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभालती है जहां 1965 और 1971 के युद्धों में भी भीषण लड़ाई हुई थी। यहां पहली बाज बटालियन की स्थापना इस ऐतिहासिक और परिचालन रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में हवाई फुर्ती, त्वरित प्रतिक्रिया और व्यापक पहुंच की जरूरत को सीधे संबोधित करती है।
यह इकाई जालंधर में मौजूदा आर्मी एविएशन स्क्वाड्रन के साथ काम करेगी, जो चीता और चेतक हेलीकॉप्टर उड़ाता है और मानवीय सहायता तथा आपदा राहत भूमिकाओं में भी सक्रिय रहता है। अधिकारियों के अनुसार बाज बटालियन अग्रिम पंक्ति की इकाइयों को उन्नत निगरानी और स्थिति-समझ के साधन उपलब्ध कराएगी, साथ ही उच्च तीव्रता वाले ड्रोन संचालन की तकनीकी और रसद जरूरतों को केंद्रीकृत करेगी।
भविष्य की दिशा
अभी तक बाज बटालियनों की अंतिम संख्या घोषित नहीं की गई है, लेकिन उम्मीद है कि समय के साथ इस मॉडल को अन्य फील्ड संरचनाओं में भी दोहराया जाएगा। यह पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर बढ़ते मानवरहित बेड़े के अनुरूप एक व्यापक सुधार प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें भैरव बटालियन, रुद्र सभी-हथियार ब्रिगेड और डिवीजन स्तर पर यूएएस तथा काउंटर-यूएएस साधनों के समन्वय के लिए एकीकृत नियंत्रण केंद्र भी शामिल हैं।
सेना अब केवल मौजूदा ढांचे में ड्रोन जोड़ने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि उनके आसपास एक समर्पित संगठनात्मक और मानव संसाधन ढांचा तैयार कर रही है। लक्ष्य है ऐसा बल बनाना जो निरंतर संवेदन, तेज निर्णय, सटीक प्रभाव और विवादित विद्युतचुंबकीय तथा वायु वातावरण में अनुकूलन कर सके।
11 कोर के तहत पहली बाज बटालियन इसलिए सिर्फ एक नई इकाई नहीं, बल्कि एक ऐसे सिद्धांतगत और संरचनात्मक बदलाव की पहली परिचालन अभिव्यक्ति है, जिसका उद्देश्य भारतीय जमीनी बलों को देश की सबसे संवेदनशील सीमाओं के ऊपर निर्णायक और स्थायी बढ़त दिलाना है।