जम्मू की एक विशेष एनआईए अदालत ने इनशा जान उर्फ इनशा तारिक की जमानत याचिका खारिज कर दी है। वह 2019 के पुलवामा आत्मघाती हमले के मामले में मुकदमे का सामना कर रही हैं, जिसमें केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 40 कर्मी मारे गए थे। विशेष न्यायाधीश प्रेम सागर ने 20 अगस्त को 15 पृष्ठों का आदेश सुनाते हुए कहा कि अभिलेख पर पर्याप्त सामग्री मौजूद है, जिससे आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं और गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, यानी यूएपीए की धारा 43-डी(5) के तहत इस चरण में रिहाई संभव नहीं है।
इनशा जान दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के हरकिपोरा, जिसे हक्रीपोरा भी कहा गया है, गांव की निवासी हैं। उन्हें उनके पिता पीर तारिक अहमद शाह, जिन्हें तारिक अहमद शाह भी कहा जाता है, के साथ 3 मार्च 2020 को गिरफ्तार किया गया था। वह छह वर्ष से अधिक समय से हिरासत में हैं और एनआईए मामले आरसी संख्या 02/2019/एनआईए/जेएमयू में रणबीर दंड संहिता, यूएपीए, शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमे का सामना कर रही हैं। उनके खिलाफ आरोप 10 दिसंबर 2022 को तय किए गए थे।
अदालत की दलील
अदालत ने कहा कि अभियोजन की जिस सामग्री पर भरोसा किया गया है, उसे अभी उन अन्य गवाहों से पुष्ट किए जाने की आवश्यकता है, जिनकी अभी तक गवाही नहीं हुई है। अदालत ने यह भी कहा कि मुकदमे की कार्यवाही जारी है और गवाहों से पूछताछ की जा रही है। विशेष न्यायाधीश प्रेम सागर ने माना कि यदि याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा किया गया तो यह पूरी संभावना है कि वह अभियोजन के महत्वपूर्ण गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे न्याय प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
अदालत ने लंबे समय तक हिरासत, मुकदमे में कथित देरी और चिकित्सकीय बीमारियों के आधार पर दिए गए बचाव पक्ष के तर्कों को भी अस्वीकार कर दिया। बचाव पक्ष ने कहा था कि छह वर्ष से अधिक की हिरासत से उनकी सेहत पर गंभीर असर पड़ा है और उन्हें त्वचा संबंधी पुरानी बीमारी, सर्वाइकल स्पॉन्डिलोसिस तथा पुराना नेत्रजन्य सिरदर्द है, जिनके लिए विशेष उपचार की आवश्यकता है। अदालत ने माना कि ये स्थितियां जीवन के लिए संकटपूर्ण नहीं हैं, इसलिए जमानत पर तत्काल रिहाई का आधार नहीं बनतीं।
यूएपीए की धारा 43-डी(5) का हवाला देते हुए, जो अधिनियम के अध्याय चार और छह के तहत अपराधों में जमानत पर रोक लगाती है, यदि अदालत को यह मानने के उचित आधार हों कि आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं, न्यायाधीश ने कहा, “ऐसा मानने के लिए पर्याप्त साक्ष्य है कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप सत्य है।” अदालत ने आरोपों की प्रकृति, गंभीरता और राज्य के व्यापक हित का उल्लेख करते हुए जमानत याचिका खारिज की। साथ ही स्पष्ट किया कि इन टिप्पणियों का मुख्य मुकदमे के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
जमानत देने से इनकार करते हुए अदालत ने बारामुला जिला जेल के अधीक्षक को निर्देश दिया कि वह इनशा जान को सभी आवश्यक चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराएं और हर पखवाड़े अदालत में अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
एनआईए के आरोप
एनआईए की आरोपपत्र के अनुसार, इनशा जान 14 फरवरी 2019 को पुलवामा जिले के लेथपोरा, जिसे लेथपुरा भी कहा गया है, में हुए हमले से जुड़ी आतंकवादी साजिश में कथित रूप से शामिल थीं। उसी दिन जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार ने विस्फोटकों से लदी गाड़ी जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रहे सीआरपीएफ काफिले में टकरा दी थी, जिसमें 40 कर्मियों की मौत हो गई और अन्य घायल हुए थे।
एजेंसी का आरोप है कि इनशा जान ने अपने पिता के साथ 2018 से 2019 के बीच 15 से अधिक बार अपने घर में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों को शरण, भोजन और रसद सहायता दी। बताया गया है कि हर बार उनका ठहराव दो से चार दिन तक रहा। उन पर पाकिस्तानी आतंकवादी मुहम्मद उमर फारूक, जो एक आईईडी निर्माता और जैश प्रमुख मसूद अजहर का भतीजा था, तथा एक अन्य पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद कामरान अली के साथ लगातार संपर्क में रहने का भी आरोप है। फारूक की मौत के बाद उसके मोबाइल फोन से व्हाट्सऐप कॉल, वॉइस नोट और तस्वीरें बरामद होने का दावा किया गया है।
एनआईए ने कहा है कि परिवार की पहचान एक पड़ोसी ने मई 2018 में जैश आतंकियों से कराई थी। इसके बाद जून 2018 में फारूक और अली के उनके घर आने का आरोप है और फिर जैश के सदस्य हथियारों और गोला-बारूद के साथ नियमित रूप से आने लगे। जनवरी 2019 में फारूक, आदिल अहमद डार और समीर अहमद डार के कई दिनों तक अत्याधुनिक हथियारों और गोला-बारूद के साथ घर में ठहरने का भी आरोप है। हमले के बाद जैश द्वारा जारी आदिल अहमद डार के प्रचार वीडियो को 28 और 29 जनवरी 2019 को उसी घर में रिकॉर्ड किए जाने का दावा किया गया है।
पहले की जांच रिपोर्टों में इनशा जान को मामले में नामजद 19 आरोपियों में एकमात्र महिला बताया गया है। अगस्त 2020 में दाखिल एनआईए की 13,800 पृष्ठों की आरोपपत्र में उन्हें शामिल किया गया था। उनके पिता पीर तारिक अहमद शाह, जो पेशे से ट्रक चालक हैं, पर भी आतंकियों की मदद करने के समान आरोप हैं।
बचाव पक्ष और एनआईए का विरोध
बचाव पक्ष ने दलील दी कि उन्हें “पूरी तरह झूठे और बिना किसी उचित आधार” के फंसाया गया है। उनका कहना था कि उनके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई और गवाहों ने भी सीधे तौर पर उन्हें अपराधों से नहीं जोड़ा है। दूसरी ओर, एनआईए ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए इसे निराधार बताया और कहा कि वह एक अत्यधिक सक्रिय आतंक सहयोगी हैं, जिन्होंने सुनियोजित तरीके से अपराध किया। एजेंसी ने याचिका को कानून से बचने का प्रयास भी बताया।
मामले की पृष्ठभूमि
पुलवामा हमला हाल के वर्षों में भारतीय सुरक्षा बलों पर हुए सबसे घातक आतंकवादी हमलों में से एक माना जाता है। एनआईए की जांच ने इस साजिश को पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के नेतृत्व से जोड़ा है और मसूद अजहर सहित कई अन्य लोगों के नाम लिए हैं, जिनमें पाकिस्तानी नागरिक और स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर शामिल हैं। आत्मघाती हमलावर और प्रमुख योजनाकारों में शामिल मुहम्मद उमर फारूक और कमरान अली जैसे कई प्रमुख आरोपी बाद में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ों में मारे गए।
इनशा जान और सह-आरोपियों के खिलाफ विशेष एनआईए अदालत, जम्मू में मुकदमा जारी है और अभियोजन के कई गवाहों की गवाही अभी बाकी है। अदालत के इस निर्णय ने यूएपीए के तहत गंभीर आतंकवाद संबंधी मामलों में जमानत प्रावधानों की सख्ती और इस हाई-प्रोफाइल मामले की चल रही न्यायिक प्रक्रिया को एक बार फिर सामने ला दिया है।