कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भारतीय सेना के एक कार्यरत सैनिक के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला खारिज कर दिया है। आधिकारिक सैन्य अभिलेखों से यह साफ हो गया था कि जिस दिन और जिस समय हूगली में कथित पड़ोसी हमले का आरोप लगाया गया, उस समय वह इंफाल में सक्रिय ड्यूटी पर था।
न्यायमूर्ति उदय कुमार ने 25 अगस्त, 2026 के आदेश में कहा कि एक “देश के सैनिक” को “स्पष्ट रूप से झूठी और प्रतिशोधपूर्ण पुलिस रिपोर्ट” के आधार पर मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर करना न्यायिक प्रक्रिया का “असहनीय दुरुपयोग” होगा। अदालत ने कहा कि कानून को उत्पीड़न का हथियार बनाने के लिए नहीं बनाया गया है और न ही आपराधिक न्याय प्रणाली को दीवानी विवादों से पैदा हुई निजी रंजिशें निपटाने के लिए उपयोग किया जा सकता है।
अदालत का यह फैसला एक वास्तविक आपराधिक मुकदमे और ऐसी शिकायत के बीच स्पष्ट अंतर दिखाता है, जो आधिकारिक अभिलेखों के आधार पर आरोपियों में से एक के खिलाफ संभव ही नहीं हो सकती थी।
जमीन के विवाद से दर्ज हो गया एफआईआर
मामला हूगली में दो परिवारों के बीच चले आ रहे स्थानीय विवाद से जुड़ा था। विवाद के केंद्र में कथित अवैध निर्माण, आने-जाने में बाधा और चार फुट चौड़े साझा मार्ग तथा निकासी नाली के उपयोग का अधिकार था। दोनों पक्ष पहले ही दीवानी अदालतों में जा चुके थे और अदालत के अनुसार, तनाव लगातार बढ़ रहा था।
शिकायतकर्ता को जब दीवानी मोर्चे पर तत्काल बढ़त नहीं मिली, तो उसने 6 दिसंबर, 2023 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। यह कथित घटना के करीब दो महीने बाद की गई थी। शिकायत में कहा गया कि 5 अक्टूबर, 2023 को सुबह 6:30 बजे दो भाइयों और अज्ञात साथियों ने उस पर हमला किया, उसकी बहन को संपत्ति खाली करने के लिए कहा, 7,500 रुपये नकद लूट लिए और धमकी दी।
इनमें से एक भाई भारतीय सेना का कार्यरत सैनिक था, जो बंगाल से काफी दूर तैनात था।
जिस बहाने को शिकायत झेल नहीं सकी
जांच में अदालत ने जिस बड़ी खामी की ओर इशारा किया, वह बेहद स्पष्ट थी। सैनिक के कमांडिंग ऑफिसर ने प्रमाणित किया कि वह कथित झगड़े की ठीक उसी तारीख और समय पर मणिपुर के इंफाल में सक्रिय सैन्य ड्यूटी पर मौजूद था। न्यायमूर्ति कुमार ने इस आधिकारिक अभिलेख को “अखंडनीय” और “प्रामाणिक” बताया।
अदालत ने कहा कि यह रिकॉर्ड उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों की विश्वसनीयता को पूरी तरह कमजोर कर देता है। अदालत ने यह भी कहा कि एफआईआर को “लापरवाह और व्यापक ढंग” से तैयार किया गया था, जिसमें एक कार्यरत सैनिक को हूगली में तड़के हुए पड़ोस के झगड़े में शामिल बता दिया गया।
अदालत के अनुसार, किसी व्यक्ति का एक ही समय में हजारों किलोमीटर दूर दो स्थानों पर मौजूद होना संभव नहीं है। इंफाल और हूगली के बीच सड़क मार्ग से यात्रा की दूरी आम तौर पर लगभग 1,500 से 2,000 किलोमीटर मानी जाती है। ऐसे में सुबह 6:30 बजे इंफाल में ड्यूटी पर मौजूद रहना और उसी समय हूगली में हमले में शामिल होना एक साथ संभव नहीं था।
पुलिस कागजों में प्रक्रियात्मक विसंगति
उच्च न्यायालय ने मामले की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट में सैनिक का नाम शामिल नहीं किया था, फिर भी उच्च न्यायालय में उसे सह-याचिकाकर्ता के रूप में पेश किया जाता रहा। न्यायाधीश ने इसे एक “प्रक्रियात्मक विसंगति” बताते हुए कहा कि इससे शुरुआती पुलिस कार्रवाई में उसे इस मुकदमे में घसीटने की “घातक खामी” सामने आती है।
दूसरे शब्दों में, शुरुआत में बिना पर्याप्त जांच के उसका नाम जोड़ा गया, जबकि बाद की जांच ने ही इस नामांकन को कमजोर कर दिया।
सैनिक के खिलाफ मामला खत्म, भाई के खिलाफ नहीं
अदालत ने दोनों भाइयों को एक जैसा नहीं माना। सैनिक का भाई स्थानीय निवासी है। अदालत के अनुसार, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और चोट संबंधी रिपोर्टें विवादित मार्ग को लेकर “झड़प” और “पड़ोस की तनातनी” की संभावना दिखाती हैं। भाई के खिलाफ कार्यवाही जारी रहेगी। राज्य ने कहा कि उसके खिलाफ गलत तरीके से रोकने और मारपीट का प्रथम दृष्टया मजबूत मामला है।
अदालत ने यह नहीं कहा कि हूगली में कुछ हुआ ही नहीं या शिकायत के हर आरोप को गढ़ लिया गया था। उसने केवल यह माना कि एक नामित आरोपी वहां हो ही नहीं सकता था, क्योंकि राज्य के अपने दस्तावेज और सेना के आधिकारिक रिकॉर्ड यह साबित करते थे कि वह कहीं और था।
वकीलों ने क्या दलील दी
भाइयों की ओर से पेश अधिवक्ता गुंजन कुमार सिंह और रुपसा मैती ने कहा कि यह आपराधिक मामला उनकी वैध दीवानी दावेदारी वापस लेने के लिए दबाव बनाने और चल रहे संपत्ति विवादों में भय दिखाने के लिए दर्ज कराया गया था। उन्होंने पुलिस जांच और सेना के रिकॉर्ड को इस बात का प्रमाण बताया कि एक भाई उस इलाके में मौजूद ही नहीं था।
राज्य की ओर से अधिवक्ता रामाशीष मुखर्जी और नील चक्रवर्ती ने स्थानीय भाई के खिलाफ मामला जारी रखने की मांग की। शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता सायन कंठिलाल और कौस्तव शोम पेश हुए।
सार्वजनिक रिपोर्टों में सैनिक, उसके भाई या शिकायतकर्ता का नाम नहीं बताया गया है।
यह फैसला एक एफआईआर से आगे क्यों है
भारतीय अदालतें लंबे समय से संपत्ति से जुड़े दीवानी विवादों को आपराधिक मुकदमों में बदलने के खिलाफ चेतावनी देती रही हैं। यह आदेश उसी परंपरा का हिस्सा है, लेकिन इसमें एक और संस्थागत चिंता जुड़ती है। एक संवेदनशील क्षेत्र में तैनात कार्यरत सैनिक को ऐसे भोर के झगड़े में आरोपी बना दिया गया, जिसमें वह मौजूद ही नहीं हो सकता था।
अदालत की भाषा असाधारण रूप से कठोर रही। उसने “अपमान और मानसिक पीड़ा”, “झूठी और प्रतिशोधपूर्ण” पुलिस रिपोर्ट और प्रक्रिया के दुरुपयोग की बात कही। यह केवल इतना नहीं है कि अभियोजन का मामला कमजोर था; यह निष्कर्ष है कि सैनिक के खिलाफ आरोप आधिकारिक अभिलेखों के सामने टिक ही नहीं पाया।
जांच के लिए इससे एक व्यावहारिक सीख भी निकलती है। जब आरोपी सशस्त्र बलों का सदस्य हो, तो तैनाती और उपस्थिति के रिकॉर्ड सामान्य ड्यूटी दस्तावेज होते हैं। यदि इन्हें शुरुआत में ही जांच लिया जाता, तो इंफाल में मौजूद व्यक्ति को हूगली की एफआईआर में नामजद करने की नौबत नहीं आती। अक्टूबर की घटना के लिए दिसंबर में दर्ज शिकायत के कारण यह जांच और भी जरूरी हो गई थी।
सैनिक के खिलाफ मामला खत्म हो गया है। संपत्ति विवाद और उसके भाई के खिलाफ आपराधिक मामला जारी है। उच्च न्यायालय ने दोनों को अलग करते हुए साफ कहा कि किसी सैनिक को एक साथ दो जगहों पर मौजूद बताकर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और चार फुट के रास्ते को लेकर चल रहा पड़ोस का झगड़ा दीवानी लड़ाई जीतने का आसान रास्ता नहीं बन सकता।