जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने सीमा सुरक्षा बल के एक कार्यरत जवान से ₹6 लाख की वसूली को बरकरार रखा है, जिसने झूठा दावा किया था कि 1993 में आतंकवादियों ने उसके परिवार के छह सदस्यों की हत्या कर दी थी। न्यायमूर्ति रजनीश ओसवाल ने 30 सितंबर 2026 के आदेश में याचिका खारिज करते हुए कहा कि परिजन पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर चले गए थे और राशि अपने पास रखना अनुचित लाभ होगा।
याचिकाकर्ता नजीर अहमद मीर कुपवाड़ा जिले के नियंत्रण रेखा के पास स्थित शल्ला बथू गांव का निवासी है। उसका कहना था कि मई 1993 में आतंकवादियों ने उसके घर को आग लगा दी और उसके पिता, माता, दो भाइयों और दो बहनों की हत्या कर दी। हालांकि उसने इस मामले में पुलिस स्टेशन कुपवाड़ा में 1997 में संपर्क किया। 8 मार्च 1997 की दैनिक डायरी प्रविष्टि में घटना दर्ज की गई, जो कथित वारदात के लगभग चार साल बाद थी। बाद में मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किए गए और 15 सितंबर 1997 को जिला स्तरीय छानबीन-सह-समन्वय समिति ने छहों व्यक्तियों के लिए ₹1 लाख प्रति व्यक्ति की मंजूरी दी। पूरी ₹6 लाख की राशि सीधे उसे दी गई।
मामला तब जांच के घेरे में आया जब मई 1999 में एक समाचार प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था “सरकार ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में रह रहे मृत परिवारों को राहत पैकेज दिया।” गृह मंत्रालय, जम्मू-कश्मीर गृह विभाग और कश्मीर संभागीय आयुक्त के आदेश पर हुई जांच में पाया गया कि परिजन मारे नहीं गए थे, बल्कि अन्य सीमावर्ती निवासियों के साथ नियंत्रण रेखा पार कर गए थे। कुपवाड़ा के अतिरिक्त उपायुक्त की प्रशासनिक जांच में निष्कर्ष निकला कि स्थानीय पुलिस और राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से जाली अभिलेखों के आधार पर राहत ली गई थी। वर्ष 2022 में वसूली का आदेश दिया गया और 2023 से सीमा सुरक्षा बल ने मीर के वेतन से 30 मासिक किस्तों में राशि काटने के निर्देश दिए।
उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि राहत की मंजूरी 25 वर्ष से अधिक पहले आधिकारिक सत्यापन के बाद दी गई थी, भारतीय एजेंसियां पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के भीतर तथ्यों की पुष्टि नहीं कर सकती थीं, और वसूली मनमानी तथा उचित सुनवाई के बिना की गई। वहीं, केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन और सीमा सुरक्षा बल ने कहा कि जांच में परिजनों के पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जाने की बात स्थापित हो चुकी थी और जवान को नोटिस देकर उसका बयान भी दर्ज किया गया था।
न्यायमूर्ति ओसवाल ने चुनौती अस्वीकार कर दी। अदालत ने कहा कि 1993 की घटना से संबंधित पुलिस अभिलेख केवल मार्च 1997 में बनाया गया, कोई शव कभी बरामद या सौंपा नहीं गया, और याचिकाकर्ता के वकील ने भी मान लिया कि शवों की सुपुर्दगी नहीं हुई थी। पीठ ने कहा कि यह मानना कठिन है कि जिसके छह परिजन 1993 में मारे जाने का दावा किया गया हो, वह चार साल तक चुप रहे। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि दस्तावेजों में विरोधाभास हैं। एक दस्तावेज में 1990 की गोलीबारी का उल्लेख था, जबकि याचिका में 1993 की आतंकवादी हिंसा की बात कही गई थी। 5 मई 1997 की एक रिपोर्ट, जो स्वयं याचिकाकर्ता के आवेदन पर शुरू हुई थी, में कहा गया था कि एक बहन को छोड़कर सभी परिजन मारे गए थे, लेकिन रिकॉर्ड में यह नहीं बताया गया कि मुआवजा केवल उसे ही क्यों दिया गया और जीवित बहन को क्यों नहीं।
अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ता यह सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा है कि उसके परिवार के छह सदस्य 1993 में मारे गए थे।” अदालत ने यह भी जोड़ा कि उसके “बार-बार बदलते दावों से स्पष्ट है कि उसमें सत्यनिष्ठा का अभाव है।” प्राकृतिक न्याय से वंचित किए जाने की दलील भी खारिज कर दी गई, क्योंकि 2001 की जांच के दौरान नोटिस जारी किया गया था और उसका बयान दर्ज किया गया था। अदालत ने कहा कि “धोखा सब कुछ नष्ट कर देता है” और समय बीत जाने से अवैध वित्तीय लाभ वैध नहीं हो जाता। पीठ ने माना कि मंजूरी पुलिस और राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से प्राप्त की गई थी और राशि अपने पास रखने की अनुमति देना अनुचित लाभ को बढ़ावा देगा। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई और वसूली आदेश यथावत रखा गया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दार खुर्शीद पेश हुए। केंद्र सरकार की ओर से उप सॉलिसिटर जनरल टी. एम. शम्सी के स्थान पर केंद्रीय सरकार के अधिवक्ता फैजान गनई ने पक्ष रखा। केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन की ओर से सरकारी अधिवक्ता इलियास लावाय उपस्थित हुए।