केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में लगातार 12 महीनों तक अभियान के दौरान किसी भी जवान या अधिकारी की जान नहीं गई है। देश के सबसे बड़े केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल ने 47 वर्षों में पहली बार ऐसा रिकॉर्ड दर्ज किया है। सीआरपीएफ के महानिदेशक ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने 1 नवंबर 2026 को एक्स पर यह जानकारी दी।
बल में अभियान के दौरान आखिरी बार जान जाने की घटना 30 अक्टूबर 2025 को हुई थी। झारखंड के पश्चिम सिंहभूम में इलाके पर नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए चलाए जा रहे अभियान के दौरान विस्फोट में इंस्पेक्टर कौशल कुमार मिश्रा और हेड कांस्टेबल महेंद्र लश्कर की मृत्यु हो गई थी। इससे पहले अभियान में किसी की जान न जाने का ऐसा दौर जनवरी 1979 में समाप्त हुआ था।
महानिदेशक सिंह ने अपनी पोस्ट में इसे सीआरपीएफ के इतिहास की अहम उपलब्धि बताया। उन्होंने इसका श्रेय आधुनिक उपकरणों, बेहतर प्रशिक्षण, रणनीतिक योजना और घटना के बाद त्वरित कार्रवाई पर बढ़े जोर को दिया। इसमें घायल कर्मियों को तेजी से ऐसे अस्पतालों तक पहुंचाना भी शामिल है, जहां अधिक उन्नत और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हों।
सिंह के मुताबिक, यह रिकॉर्ड ऐसे समय बना जब बल प्रमुख अभियान क्षेत्रों में पूरी तरह तैनात और सक्रिय रहा तथा उसे महत्वपूर्ण सफलताएं भी मिलीं। उन्होंने देश और नागरिकों की शांति व सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई।
यह रिकॉर्ड वामपंथी उग्रवाद में तेज गिरावट और उसके औपचारिक अंत की घोषणा के बीच सामने आया है। सरकार ने अपनी तय समयसीमा पूरी करते हुए लगभग 30–31 मार्च 2026 को भारत को नक्सलवाद-माओवाद से मुक्त घोषित किया था। अब कोई जिला वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित नहीं रह गया है, जबकि 2000 के दशक के मध्य में इसके चरम पर ऐसे जिलों की संख्या 100 से अधिक थी।
नक्सल विरोधी अभियानों के चरम दौर में प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ के करीब 50,000 कर्मी तैनात थे। इनमें लगभग 40,000 छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में थे। वर्ष 2025 में जान गंवाने वाले सीआरपीएफ के नौ कर्मियों में से आठ की मृत्यु झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हुई थी, जबकि एक की जान फील्ड फायरिंग अभ्यास के दौरान गई थी। वर्ष 2024 में छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर में बल के कुल 12 कर्मियों की मृत्यु हुई थी।
बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण, गिरफ्तारियों और शीर्ष माओवादी नेतृत्व के मारे जाने से सीआरपीएफ के लिए अभियान संबंधी परिस्थितियां काफी बदली हैं। इनमें 28 जुलाई 2026 को माओवादी केंद्रीय समिति के आखिरी सदस्य मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी भी शामिल है। सीआरपीएफ में तीन लाख से अधिक कर्मी हैं।
अब तैनाती का ध्यान अन्य क्षेत्रों, खासकर मणिपुर की ओर बढ़ा है, जहां नगा और कुकी समूहों से जुड़ी जातीय हिंसा जारी है। बस्तर से कई बटालियनों को दूसरी जगहों पर तैनात किया गया है। सीआरपीएफ ने मणिपुर में अभियान स्थगन समझौते यानी एसओओ के दायरे में आने वाले संगठनों के कैडरों के कुछ शिविरों का नियंत्रण भी संभाला है और कुछ स्थानों पर असम राइफल्स की जगह ली है। हाल में इंफाल में बम हमलों में सीआरपीएफ कर्मी घायल हुए हैं।
सुरक्षा अभियानों के साथ बल मणिपुर के गांवों में नागरिक सहायता कार्यक्रम भी चला रहा है। इनके तहत सौर ऊर्जा से चलने वाली स्ट्रीट लाइटें, पानी की टंकियां और अन्य जरूरी सामान वितरित किए जा रहे हैं।
अभियान के दौरान किसी की जान न जाने का यह रिकॉर्ड अन्य कारणों से हुई मौतों से अलग है। सीआरपीएफ कर्मियों की आत्महत्या से जुड़ी अलग रिपोर्टें भी सामने आई हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जनवरी से मई 2026 के बीच ऐसे 19 मामलों का संज्ञान लिया था।
ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह असम-मेघालय कैडर के 1991 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और इससे पहले असम पुलिस के महानिदेशक रह चुके हैं। उन्होंने जनवरी 2025 में सीआरपीएफ महानिदेशक का पद संभाला था। उनका कार्यकाल 30 नवंबर 2027 को सेवानिवृत्ति तक है।