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डिफेन्स न्यूज़

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सैनिकों की दिव्यांग पेंशन के खिलाफ केंद्र की 271 अपीलें खारिज कीं

SSBCrack News Desk
Last updated: सितम्बर 16, 2026 10:23 अपराह्न
SSBCrack News Desk
Published: सितम्बर 16, 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सैनिकों की दिव्यांग पेंशन के खिलाफ केंद्र की 271 अपीलें खारिज कीं

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की लगभग 271 दीवानी अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं के समूह को खारिज कर दिया है। ये याचिकाएं उन आदेशों को चुनौती देती थीं, जिनमें सेवानिवृत्त सशस्त्र बल कर्मियों को सेवा पेंशन के दिव्यांगता तत्व का लाभ दिया गया था।

Contents
  • 1982 और 2008 नियमों पर कानूनी विवाद
  • भार का प्रश्न और 15 वर्ष का नियम
  • चिकित्सकीय बोर्ड की राय का महत्व
  • लगातार मुकदमेबाजी पर टिप्पणी
  • फैसले का परिणाम

दो न्यायाधीशों की पीठ, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे, ने 15 सितंबर 2026 को Union of India and Others v. Col. N.C. Isaac (Retd.) and connected matters (2026 INSC 993) में यह फैसला सुनाया। अदालत ने इन याचिकाओं को देरी के आधार पर भी और गुण-दोष के आधार पर भी खारिज किया।

मामले में मुख्य विवाद उन सेवानिवृत्त कर्मियों की दिव्यांगता पेंशन का था, जिनकी दिव्यांगताओं को रिलीज़ मेडिकल बोर्ड ने सैन्य सेवा से “न तो संबद्ध और न ही बढ़ी हुई” यानी एनएएनए माना था। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और कई उच्च न्यायालयों ने इन वर्गीकरणों को पलटते हुए राहत दी थी, जिसके बाद केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय पहुंची।

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1982 और 2008 नियमों पर कानूनी विवाद

केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने दलील दी कि Casualty Pensionary Awards, 2008 के पात्रता नियमों ने 1982 के नियमों से स्पष्ट बदलाव किया। पहले के ढांचे में, जो व्यक्ति सेवा में स्वस्थ होकर आता था और बाद में दिव्यांगता के साथ सेवा से बाहर होता था, उसके लिए सामान्यतः यह अनुमान लगाया जाता था कि दिव्यांगता सेवा के कारण हुई है।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि 2008 के नियमों ने प्रवेश के समय मौजूद इस अनुमान को हटा दिया और कारणात्मक संबंध की आवश्यकता को मजबूत किया। हालांकि अदालत ने कहा कि इससे पूर्ववर्ती योजना की लाभकारी संरचना समाप्त नहीं हुई। संबद्धता, बढ़ोतरी, उचित संदेह और प्राथमिक भार से जुड़े लाभकारी प्रावधान काफी हद तक यथावत बने रहे।

पीठ ने कहा कि केवल कारणात्मक शर्त जोड़ देने और उस अनुमान को हटा देने से, कि सेवा में स्वस्थ प्रवेश करने वाला सदस्य यदि दिव्यांगता के साथ बाहर आता है तो वह सेवा से संबंधित मानी जाएगी, 2008 के पात्रता नियमों की मूल योजना नहीं बदलती। अदालत के अनुसार यह साबित करने का भार कि सदस्य की दिव्यांगता सेवा से संबंधित नहीं है, अब भी नियोक्ता पर ही रहता है।

भार का प्रश्न और 15 वर्ष का नियम

सेवानिवृत्ति, अनार्हता या सेवा-समापन के 15 वर्ष के भीतर दायर दावों में प्राथमिक भार अब भी स्थापना पक्ष पर रहता है। यदि दिव्यांगता का कारण अज्ञात हो और सेवा-सम्बद्धता का अनुमान खंडित न हुआ हो, तो ऐसी दिव्यांगता को सेवा से संबंधित माना जाएगा।

2008 के नियमों में वास्तविक परिवर्तन नियम 7 के परंतुक के रूप में आया है। यदि कोई दावा सेवा छोड़ने के 15 वर्ष बाद दायर किया जाता है, तो भार आवेदक पर स्थानांतरित हो जाता है। अदालत ने इसे एक साक्ष्यगत सुरक्षा उपाय बताया, क्योंकि उस अवधि के बाद सेवा अभिलेख उपलब्ध न भी हों।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 1982 के नियमों के तहत दिया गया फैसला Dharamvir Singh, 2008 के नियमों से शासित मामलों पर यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

चिकित्सकीय बोर्ड की राय का महत्व

सर्वोच्च न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल की इस दलील को स्वीकार किया कि चिकित्सकीय बोर्ड की राय, एक विशेषज्ञ निकाय की राय होने के कारण, उचित महत्व की अधिकारी है और केवल इसलिए नहीं बदली जा सकती कि कोई दूसरा दृष्टिकोण संभव है। लंबित दावों पर सुनवाई करने वाले न्यायाधिकरणों को बोर्ड के तर्क का विस्तार से परीक्षण करना होगा।

अदालत ने कहा कि कोई नकारात्मक निष्कर्ष तभी विभाग के भार को समाप्त करेगा, जब वह ठोस और तर्कसंगत हो। पूर्व सैनिक बोर्ड की प्रक्रिया या निष्कर्षों में कमियों की ओर संकेत करके प्रथम दृष्टया अपना मामला बना सकता है।

लगातार मुकदमेबाजी पर टिप्पणी

पीठ ने दर्ज किया कि रक्षा मंत्रालय की 2015 की रक्षामंत्री रिपोर्ट, Review of Service and Pension Matters, Including Potential Disputes, Minimising Litigation and Strengthening Institutional Mechanisms Related to Redressal of Grievances, ने दिव्यांग सैनिकों के विरुद्ध इस तरह की अपीलें तत्काल वापस लेने की सिफारिश की थी। मंत्रालय ने उस सिफारिश को स्वीकार भी किया था, फिर भी ऐसी अपीलें दायर होती रहीं। अदालत ने इसे खेद का विषय बताया।

2015 की रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि भारत में अनेक दिव्यांग सैनिकों को अब भी अत्यधिक तकनीकी आधारों पर लाभ नहीं दिए जाते, जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं सामान्यतः सेवा के दौरान या अधिकृत अवकाश के समय हुई दिव्यांगता को सेवा से संबद्ध या उससे बढ़ी हुई मानती हैं।

अदालत ने विभागीय अपीलीय चरणों में अस्वीकृति की व्यापकता पर भी ध्यान दिया। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रथम अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष 2,997 अपीलों में से 2,855 खारिज की गईं और केवल 142 स्वीकार हुईं। द्वितीय अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष 456 में से 439 अपीलें खारिज हुईं और केवल 17 स्वीकार की गईं।

पीठ ने यह भी कहा कि उसके समक्ष आए 271 मामलों में से अधिकांश स्वयं समय-सीमा से बाहर थे, और इसे इस मुकदमेबाजी का “दुखद पहलू” बताया।

फैसले का परिणाम

सर्वोच्च न्यायालय ने किसी हस्तक्षेप का आधार न पाते हुए केंद्र की अपीलों और याचिकाओं को देरी तथा गुण-दोष, दोनों आधारों पर खारिज कर दिया। साथ ही भविष्य के मामलों के लिए दो स्पष्टताएं दीं कि चिकित्सकीय बोर्ड की राय को उचित महत्व दिया जाए और उसका विस्तार से परीक्षण किया जाए, तथा 15 वर्ष के बाद दायर दावों पर नियम 7 का परंतुक लागू होगा और भार आवेदक पर रहेगा।

इस फैसले से वर्तमान समूह में सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और उच्च न्यायालयों द्वारा पहले दिए गए दिव्यांगता पेंशन के लाभ यथावत बने रहते हैं। साथ ही 2008 के पात्रता नियमों के तहत समान दावों की जांच के लिए एक अधिक स्पष्ट ढांचा भी तय होता है।

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