लखनऊ, 22 सितंबर 2026 — इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने सशस्त्र सीमा बल के एक उप कमांडेंट की बर्खास्तगी रद्द कर दी है। उन्हें सेवा में शामिल होते समय विवाह छिपाने के आरोप में हटाया गया था। अदालत ने कहा कि केवल आर्य समाज विवाह प्रमाणपत्र, अपने आप में, हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आवश्यक संस्कारों के अभाव में वैध हिंदू विवाह साबित नहीं करता।
न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने पांडेय की याचिका स्वीकार करते हुए 28 अप्रैल 2022 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द किया और अधिकारियों को उन्हें तुरंत ड्यूटी पर वापस लेने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हटाए जाने की तारीख से निर्णय तक की अवधि “नो वर्क, नो पे” मानी जाएगी, लेकिन इसे सेवा में विराम नहीं माना जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
पांडेय का चयन 5 दिसंबर 2009 को सशस्त्र सीमा बल में सहायक कमांडेंट (सामान्य ड्यूटी) के रूप में हुआ था। 22 मार्च 2016 को उन्हें उप कमांडेंट पद पर पदोन्नत किया गया। सेवा में शामिल होते समय उन्होंने स्वयं को अविवाहित घोषित किया था।
विवाद की शुरुआत सुचिता की शिकायतों से हुई, जिनका कहना था कि 16 अगस्त 2007 को कृष्णनगर, प्रयाग, इलाहाबाद स्थित आर्य समाज मंदिर में उनसे पांडेय का विवाह हुआ था। उन्होंने विभाग से अपने नाम को उनकी सेवा पुस्तिका में दर्ज करने की मांग की और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत कार्यवाही शुरू की। इसके बाद एक जांच हुई।
उसके बयान, पुरोहित के बयान और नोटरी प्रमाणपत्रों के आधार पर सशस्त्र सीमा बल ने कथित विवाह को वैध माना और निष्कर्ष निकाला कि अधिकारी का घोषणा-पत्र झूठा था। इसी आधार पर उन्हें 28 अप्रैल 2022 को सेवा से हटाया गया। विभाग ने 13 दिसंबर 2015 को साधना तिवारी से हुए विवाह को भी दूसरी शादी मानते हुए अयोग्यता का अतिरिक्त आधार बताया।
प्रतिवादियों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने सत्यापन प्रपत्र में लंबित आपराधिक मामले के बावजूद पूर्व अभियोजन के प्रश्न के उत्तर में “नहीं” लिखा था।
अधिकारी का पक्ष
पांडेय का कहना था कि उनके परिवार के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन उसे अस्वीकार कर दिया गया। उनके अनुसार बाद की शिकायतें उन पर विवाह का दबाव बनाने के लिए की गईं। उन्होंने कहा कि हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार कोई विवाह सम्पन्न ही नहीं हुआ था।
उन्होंने प्रतापगढ़ के गदवारा चौकी की एक पुलिस रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें ग्रामीणों के अनुसार विवाह न होने की बात दर्ज थी, हालांकि शिकायतकर्ता पक्ष के लोग विवाह कराने को तैयार थे।
धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उनकी अर्जी खारिज हो गई थी। मामले संख्या 1548/2013 में, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए और 323 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दर्ज था, विचारण न्यायालय ने शिकायतकर्ता के बयान में गंभीर विरोधाभास पाए और उन्हें बरी कर दिया। संबंधित कार्यवाही में एक रिट अदालत से पहले ही संरक्षण दिया जा चुका था।
आपराधिक मुकदमे के दौरान स्वयं शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया था कि कथित विवाह हिंदू रस्मों और सप्तपदी के बिना हुआ था।
उच्च न्यायालय के निष्कर्ष
अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह तभी वैध होता है जब सप्तपदी सहित आवश्यक हिंदू संस्कार किए जाएं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय प्रिया बाला घोष बनाम सुरेश चंद्र घोष (1971) का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि केवल आर्य समाज मंदिर का प्रमाणपत्र यह साबित नहीं कर सकता कि विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार सम्पन्न हुआ था।
अदालत ने शांति देव बरमा बनाम कंचन प्रवा देवी के सिद्धांत का भी उल्लेख किया कि विवाह का साक्ष्य ठोस होना चाहिए और केवल पत्रों या मौखिक दावों पर आधारित नहीं हो सकता।
शिकायतकर्ता की स्वयं की स्वीकारोक्ति के मद्देनजर, 16 अगस्त 2007 का कथित अनुष्ठान कानून की दृष्टि में विवाह नहीं माना जा सकता था। इसलिए इसे अधिकारी की सेवा-योग्यता समाप्त करने या उनकी बर्खास्तगी का आधार नहीं बनाया जा सकता था।
चूंकि 2007 का अनुष्ठान वैध विवाह नहीं था, इसलिए दिसंबर 2015 में हुआ विवाह दूसरी शादी नहीं माना जा सकता था और इसी आधार पर उन्हें सेवा के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता था। पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि चुनौती दिया गया आदेश एक अस्थिर निष्कर्ष पर आधारित था और याचिका स्वीकार कर ली।
अदालती आदेश
अदालत ने 28 अप्रैल 2022 का आदेश रद्द करते हुए भारत सरकार और सशस्त्र सीमा बल को याचिकाकर्ता को तत्काल ड्यूटी पर लौटने देने का निर्देश दिया। इस बीच की अवधि को “नो वर्क, नो पे” माना जाएगा, लेकिन सेवा में किसी प्रकार का विराम नहीं माना जाएगा।
यह फैसला 18 सितंबर 2026 को रिट-ए संख्या 4741/2022 में सुनाया गया। आदेश में यह भी रेखांकित किया गया कि वैवाहिक स्थिति के आधार पर जब सेवा से हटाने जैसी कठोर सजा दी जाती है, तो वह किसी विधिसम्मत विवाह और हिंदू विवाह अधिनियम की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले प्रमाण पर ही आधारित होनी चाहिए, न कि केवल किसी प्रमाणपत्र या अप्रमाणित दावे पर।