सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) की चंडीगढ़ पीठ ने पाकिस्तान से जुड़े जासूसी मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व सैन्यकर्मी रमनदीप अत्री की बची हुई जेल की सजा निलंबित कर दी है। पीठ ने उनकी अपील लंबित रहने तक उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। अत्री को पैसे के बदले संवेदनशील सैन्य जानकारी साझा करने के आरोप में जनरल कोर्ट मार्शल ने दोषी ठहराया था।
न्यायमूर्ति सुधीर मित्तल और लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) रवेंद्र पाल सिंह की पीठ ने 16 अक्टूबर के आदेश में कहा कि अत्री चार साल की सजा का एक-तिहाई से अधिक समय हिरासत में बिता चुके हैं। अपील पर निकट भविष्य में फैसला होने की संभावना भी नहीं है। इसी आधार पर पीठ ने न्यायहित में अपील लंबित रहने तक शेष सजा निलंबित करने का निर्णय लिया।
जनरल कोर्ट मार्शल ने 5 मई 2025 को अत्री को सेवा से बर्खास्त करने और चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। उन्होंने आरोपपत्र, कोर्ट मार्शल गठित करने के आदेश, निष्कर्षों और सजा समेत पूरी कार्यवाही को चुनौती दी है।
न्यायाधिकरण ने 5 अगस्त को उनकी अपील स्वीकार करते समय मुकदमा शुरू करने की कानूनी समय-सीमा पर भी सवाल उठाया था। पीठ ने प्रथम दृष्टया माना था कि इस मामले में मुकदमा निर्धारित समय-सीमा बीतने के बाद शुरू किया गया। आगे की कार्यवाही के लिए मामला 9 अप्रैल 2027 तक स्थगित कर दिया गया है।
संवेदनशील सैन्य दस्तावेज साझा करने का आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार, अत्री एक इन्फैंट्री यूनिट से संबद्ध थे। आरोप है कि बचपन के मित्र हरपाल सिंह के जरिए उनका संपर्क पाकिस्तान में मौजूद खुफिया एजेंट बाबा बधावा से हुआ। हरपाल सिंह पर भारत में हैंडलर के तौर पर काम करने का आरोप है।
अभियोजन का आरोप है कि अत्री ने हरपाल सिंह को तीन आधिकारिक दस्तावेज दिए और उन्हें पता था कि यह जानकारी आगे पाकिस्तान स्थित एजेंट तक पहुंचाई जाएगी। इन दस्तावेजों में पुलवामा हमलों की तारीख का उल्लेख करने वाला एक पत्र, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के कर्मियों के नाम वाली एक पीडीएफ फाइल और रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी रिकॉर्ड्स के टेलीफोन नंबरों वाला एक पत्र शामिल बताया गया है।
अत्री के खिलाफ सेना अधिनियम और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए थे। अभियोजन के मुताबिक, उन्हें जानकारी साझा करने के बदले 15,000 रुपये मिले थे।
बचाव पक्ष ने समय-सीमा और साक्ष्यों पर उठाए सवाल
अत्री के वकील राजेश सहगल ने दलील दी कि मुकदमा शुरू करने की कानूनी समय-सीमा समाप्त हो चुकी थी। बचाव पक्ष के अनुसार, कथित अपराध 2 जनवरी 2021 को हुआ था और कमांडिंग ऑफिसर को अत्री की कथित संलिप्तता की जानकारी 2 फरवरी 2021 को मिल गई थी। इसके बावजूद जनरल कोर्ट मार्शल की कार्यवाही 25 फरवरी 2025 को शुरू हुई। सहगल ने इसी अंतराल के आधार पर कार्यवाही की वैधता पर सवाल उठाया।
बचाव पक्ष ने 16 नवंबर 2024 को दर्ज न्यायिक स्वीकारोक्ति पर भी आपत्ति जताई। उसने दलील दी कि गोपनीय दस्तावेजों की प्रतियां, अत्री और पाकिस्तान स्थित एजेंट के बीच सीधे संपर्क के रिकॉर्ड तथा कथित भुगतान की पुष्टि करने वाली रकम की बरामदगी या दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।
सहगल ने कथित भुगतान की राशि में अंतर का मुद्दा भी उठाया। उनके अनुसार, आरोपपत्र में 15,000 रुपये का उल्लेख है, जबकि जांच अधिकारी की गवाही में कथित तौर पर 50,000 रुपये बताए गए थे।
ये दलीलें अत्री की अपील का हिस्सा हैं। अपील स्वीकार करते समय न्यायाधिकरण की प्रथम दृष्टया टिप्पणियां और अब शेष सजा का निलंबन, दोषसिद्धि को रद्द करने या आरोपों पर अंतिम फैसला देने के समान नहीं हैं। अपील पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है।