पुणे, 27 जुलाई: सेना इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियो-थोरेसिक साइंसेज (एआईसीटीएस), पुणे के विशेषज्ञों ने एक दुर्लभ और अत्यंत जटिल न्यूनतम आक्रामक हृदय प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। इस उपलब्धि को सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा (एएफएमएस) में उन्नत हृदय उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
यह उपचार उस मरीज पर किया गया, जिसका पहले हृदय वाल्व प्रत्यारोपण ऑपरेशन हो चुका था और बाद में उसके हृदय के दाहिने हिस्से के ट्राइकसपिड वाल्व में गंभीर रिसाव हो गया था। इस जटिल स्थिति को दूर करने के लिए टीम ने बाइकेवल ट्रांसकैथेटर वाल्व इम्प्लांटेशन यानी सीएवीआई प्रक्रिया अपनाई।
इस प्रक्रिया में ऊपरी और निचली वेना कावा, यानी वे दो प्रमुख शिराएँ जो रक्त को हृदय के दाहिने हिस्से तक लौटाती हैं, उनमें एक साथ दो कृत्रिम वाल्व लगाए गए। इस कैथेटर-आधारित तकनीक के जरिए मरीज का इलाज बिना दोबारा ओपन-हार्ट सर्जरी किए किया गया, जिससे शल्य-जोखिम और स्वस्थ होने में लगने वाला समय दोनों कम हो गए।
यह उपलब्धि भारत के सैन्य चिकित्सा संस्थानों की उस बढ़ती क्षमता को भी दर्शाती है, जिसके तहत वे अत्याधुनिक संरचनात्मक हृदय हस्तक्षेप कर रहे हैं। दुनिया भर में ऐसे उपचार केवल कुछ ही अत्यधिक विशेषज्ञ कार्डियक केंद्रों में उपलब्ध हैं।
एआईसीटीएस के अनुसार, मरीज ने पहले हृदय वाल्व प्रतिस्थापन कराया था, लेकिन बाद में उसमें गंभीर ट्राइकसपिड रिगर्जिटेशन विकसित हो गया। इस स्थिति में ट्राइकसपिड वाल्व ठीक से बंद नहीं हो पाता, जिससे रक्त शरीर की शिरा-परिसंचरण प्रणाली में उल्टा बहने लगता है।
यह बीमारी अक्सर पैरों और पेट में सूजन, यकृत में रक्त-संचय, थकान और सांस फूलने जैसे गंभीर लक्षण पैदा करती है। जिन मरीजों की पहले ओपन-हार्ट सर्जरी हो चुकी होती है, उनमें दोबारा शल्य-क्रिया करना अधिक जोखिम भरा होता है, क्योंकि उनमें निशान ऊतक, पहले हुए हस्तक्षेप और संबंधित चिकित्सकीय जटिलताएँ मौजूद रहती हैं।
इन चुनौतियों को देखते हुए एआईसीटीएस की बहुविषयक हृदय टीम ने न्यूनतम आक्रामक कैथेटर-आधारित तरीका चुना। उन्नत हस्तक्षेप तकनीकों की मदद से उन्होंने दाहिने आलिंद तक जाने वाली शिराओं में एक साथ दो कृत्रिम वाल्व लगाए। इन नए वाल्वों ने रक्त के उल्टे प्रवाह को प्रभावी ढंग से रोका और दूसरी बड़ी शल्य-क्रिया की आवश्यकता समाप्त कर दी।
हस्तक्षेप के बाद मरीज की स्थिति सफलतापूर्वक संभल गई। यह परिणाम सावधानीपूर्वक चुने गए उच्च-जोखिम वाले मरीजों के लिए इस उन्नत उपचार विकल्प की प्रभावशीलता को रेखांकित करता है।
चिकित्सकीय विशेषज्ञ बाइकेवल ट्रांसकैथेटर वाल्व इम्प्लांटेशन को संरचनात्मक हृदय रोग के क्षेत्र की सबसे तकनीकी रूप से कठिन प्रक्रियाओं में से एक मानते हैं। ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व रिप्लेसमेंट (टीएवीआर) की तरह यह उपचार अब तक व्यापक रूप से स्थापित नहीं हुआ है और वैश्विक स्तर पर इसका अनुभव सीमित है।
यह प्रक्रिया मुख्य रूप से उन मरीजों के लिए सुझाई जाती है, जो गंभीर ट्राइकसपिड रिगर्जिटेशन से पीड़ित हों और उन्नत आयु, पहले हो चुके हृदय ऑपरेशनों या अनेक अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण पारंपरिक सर्जरी के लिए उपयुक्त न माने जाएँ।
एआईसीटीएस में इस दुर्लभ प्रक्रिया की सफल समाप्ति भारत में सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा के भीतर न्यूनतम आक्रामक हृदय देखभाल के तेज़ विकास को दर्शाती है। यह भारतीय सैन्य हृदय रोग विशेषज्ञों की उस बढ़ती दक्षता को भी सामने लाती है, जिसके जरिए वे ऐसे जटिल कैथेटर-आधारित उपचार अपना रहे हैं जो पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प देते हैं।
यह उपलब्धि एआईसीटीएस पुणे की प्रतिष्ठा को भारत के प्रमुख जटिल हृदय-थोरैसिक देखभाल और उन्नत हृदय हस्तक्षेप केंद्रों में और मजबूत करती है। जैसे-जैसे दुनिया भर में संरचनात्मक हृदय चिकित्सा आगे बढ़ रही है, ऐसी उपलब्धियाँ संस्थान की विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने और नवाचारी जीवनरक्षक उपचारों तक पहुँच बढ़ाने की प्रतिबद्धता को और पुष्ट करती हैं।