नई दिल्ली: अपने बल में आत्महत्याओं के पांच साल के उच्च स्तर पर पहुंचने से चिंतित केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने वरिष्ठ अधिकारियों का 10 सदस्यीय उच्चस्तरीय कोर समूह गठित किया है। इस समूह को आत्महत्या और आत्म-क्षति के मामलों की व्यवस्थित समीक्षा करने, बार-बार सामने आने वाले जोखिम कारकों की पहचान करने और संस्थागत रोकथाम उपायों को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है।
लगभग 3.25 लाख कर्मियों वाले देश के सबसे बड़े केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में 2025 में आत्महत्या से 59 मौतें दर्ज हुईं, जो 2021 के बाद का सबसे ऊंचा वार्षिक आंकड़ा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2021 में 57, 2022 में 43, 2023 में 57, 2024 में 46 और 2025 में 59 मामले दर्ज हुए। मई 2026 के अंत तक 19 ऐसी मौतों की सूचना मिली।
2021 से 2025 के पांच वर्षों में बल में कुल 262 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। इनमें 77 प्रतिशत से अधिक मामलों में, यानी 262 में से 202 में, कर्मी ड्यूटी पर थे, जबकि शेष मामले अवकाश के दौरान हुए। इन मौतों में 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी सिपाही और अन्य गैर-राजपत्रित रैंकों की रही।
कोर समूह की संरचना और कार्यप्रणाली
इस कोर समूह की अगुवाई सीआरपीएफ के महानिदेशक जी.पी. सिंह कर रहे हैं, जिन्हें जीपी सिंह या ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह भी कहा जाता है। इसमें महत्वपूर्ण शाखाओं से वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया है, जिनमें विशेष महानिदेशक, अतिरिक्त महानिदेशक, संचालन, कार्मिक, प्रशासन और चिकित्सा के महानिरीक्षक तथा दो उप महानिरीक्षक शामिल हैं। उप महानिरीक्षक, कल्याण, इस समूह के संयोजक के रूप में काम करेंगे।
समूह की बैठक हर महीने, प्राथमिकता से तीसरे सप्ताह में, बल मुख्यालय में होगी। बैठक में पिछले अवधि में सामने आए आत्म-क्षति के मामलों की विस्तृत समीक्षा की जाएगी। प्रत्येक मामले के लिए संबंधित कार्यालय प्रमुख या बटालियन के कमांडेंट को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से चार से पांच स्लाइड का संरचित प्रस्तुतीकरण देना होगा। इसमें व्यक्ति की पृष्ठभूमि, घटना तक पहुंचाने वाली परिस्थितियां, इकाई द्वारा उठाए गए कदम, उपलब्ध कराई गई कल्याण और चिकित्सा सहायता, प्रारंभिक जांच के निष्कर्ष और पुनरावृत्ति रोकने के लिए शुरू किए गए उपाय शामिल होंगे।
शृंखला-ए-आदेश में मौजूद पर्यवेक्षणीय परिचालन अधिकारी, यानी संबंधित उप महानिरीक्षक, महानिरीक्षक और अतिरिक्त महानिदेशक या विशेष महानिदेशक, भी वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये समीक्षा में शामिल होंगे। कोर समूह को प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच कर आवश्यक होने पर रोकथाम, कल्याण, प्रशासनिक और चिकित्सा उपाय सुझाने का काम सौंपा गया है। यह मामलों में समान प्रवृत्तियों और दोहराए जाने वाले जोखिम कारकों की पहचान करेगा तथा बल स्तर पर संस्थागत हस्तक्षेपों का प्रस्ताव देगा।
उप महानिरीक्षक, कल्याण, बैठकों के समन्वय, मामले से जुड़ी जानकारी संकलित करने, कार्यसूची और कार्यवृत्त प्रसारित करने तथा सिफारिशों और अनुवर्ती कार्रवाई का रिकॉर्ड रखने का काम करेंगे।
यह निर्णय इस महीने की शुरुआत में सीआरपीएफ मुख्यालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद लिया गया, जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों ने ऐसे मामलों की जांच के लिए बल-स्तरीय संरचित व्यवस्था के अभाव पर चर्चा की थी।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की दखल
यह कदम उन मीडिया रिपोर्टों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्वतः संज्ञान लेने के कुछ दिन बाद आया है, जिनमें आत्महत्याओं में बढ़ोतरी का जिक्र किया गया था। 14 अगस्त को आयोग ने केंद्रीय गृह सचिव और सीआरपीएफ महानिदेशक को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी। आयोग ने कहा कि यदि रिपोर्ट किए गए आंकड़े सही हैं, तो वे देश के सबसे बड़े केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में सेवा देने वाले कर्मियों के जीवन के अधिकार से जुड़े गंभीर प्रश्न उठाते हैं।
परिचालन दबाव और पृष्ठभूमि की चुनौतियां
सीआरपीएफ कर्मी लगातार उच्च परिचालन दबाव में काम करते हैं। किसी भी समय बल की परिचालन क्षमता का अनुमानित 95 से 97 प्रतिशत हिस्सा देश भर में आतंकवाद-रोधी, उग्रवाद-रोधी, नक्सल-रोधी या कानून-व्यवस्था संबंधी ड्यूटी पर तैनात रहता है। अधिकारियों और पूर्व आकलनों में बार-बार कुछ कारणों की ओर इशारा किया गया है, जिनमें परिवारों से लंबे समय तक दूरी, कार्य और निजी जीवन में संतुलन बनाने में कठिनाई, व्यक्तिगत और घरेलू समस्याएं, आर्थिक तनाव और निरंतर कठिन ड्यूटी का संचयी दबाव शामिल है।
बल द्वारा पहले किए गए प्रयासों में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम, वित्तीय साक्षरता पहल, चौपाल शैली की अनौपचारिक समूह बैठकें, व्यवहार संबंधी चेतावनी संकेतों की निगरानी के लिए मानक कार्यप्रणाली, कंपनी-स्तरीय कल्याण समितियां और अवकाश से लौटने वाले कर्मियों के साक्षात्कार शामिल रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि जवानों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए उपाय लगातार जारी हैं।
नई व्यवस्था का महत्व
महानिदेशक के नेतृत्व में स्थायी कोर समूह का गठन केवल प्रतिक्रियात्मक, इकाई-स्तरीय कार्रवाई से आगे बढ़कर मुख्यालय-आधारित निरंतर जवाबदेही और प्रवृत्ति पहचान की व्यवस्था की ओर संकेत करता है। इकाई कमांडरों से संरचित प्रस्तुतीकरण मांगकर और वरिष्ठ परिचालन अधिकारियों को समीक्षा में शामिल कर यह तंत्र समय पर हस्तक्षेप, जिम्मेदारी तय करने और केवल बटालियन-स्तरीय सुधारों के बजाय पूरे बल में संस्थागत सुधारों को संभव बनाने का प्रयास करेगा।
अब यह देखा जाएगा कि नई मासिक समीक्षा प्रक्रिया और मौजूदा कल्याण उपाय मिलकर क्या उन लगातार ऊंचे आंकड़ों को कम कर पाते हैं, जो पिछले पांच वर्षों में बिना किसी स्पष्ट गिरावट के ऊपर-नीचे होते रहे हैं। इस पर बल नेतृत्व, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भी करीबी नजर रहेगी।
सीआरपीएफ देश की प्रमुख आंतरिक सुरक्षा बल बना हुआ है और सबसे चुनौतीपूर्ण परिचालन परिस्थितियों में भारी तैनाती का बोझ उठाता है। इस कोर समूह की स्थापना इस बात की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि उस बोझ की मानवीय कीमत को संगठन के सर्वोच्च स्तरों पर लगातार और संरचित ध्यान की आवश्यकता है।