रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के विक्रम VT-21 इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल के पहिए वाले संस्करण ने विकास परीक्षणों के दौरान परिचालन जरूरतें पूरी की हैं। अगली पीढ़ी के इस लड़ाकू वाहन को अब भारतीय सेना के आगे के परीक्षणों से गुजरना होगा।
DRDO के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, पहिए वाले वाहन के व्यापक परीक्षणों के नतीजे उत्साहजनक रहे हैं। वाहन ने टर्रेट लगे होने के साथ चलने, खाइयां पार करने और पानी में संचालन की क्षमता का सफल प्रदर्शन किया। इसके ट्रैक वाले संस्करण के परीक्षण भी समानांतर रूप से चल रहे हैं।
दोनों संस्करण अहिल्यानगर स्थित DRDO की प्रयोगशाला व्हीकल रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (VRDE) ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और भारत फोर्ज लिमिटेड के सहयोग से विकसित किए हैं। कई सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों ने भी इसमें योगदान दिया है। इनके प्रोटोटाइप 25 अप्रैल 2026 को पहली बार प्रदर्शित किए गए थे।
DRDO का लक्ष्य इन वाहनों को 2029 तक सेना में शामिल कराना है। हालांकि, यह परीक्षणों में सफलता और भारतीय सेना की स्वीकृति पर निर्भर करेगा। सेना अब रेगिस्तानी, मैदानी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इनके उपयोगकर्ता परीक्षण करेगी। इनमें वाहन की गतिशीलता, हथियार प्रणालियों, फायरिंग क्षमता और अलग-अलग परिचालन परिस्थितियों में प्रदर्शन को परखा जाएगा। परीक्षणों से मिले सुझावों के आधार पर जरूरी बदलाव किए जाएंगे।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य रूसी मूल के पुराने BMP-II इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल की जगह लेना है। BMP-II वाहन 1980 के दशक से भारतीय सेना की मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री का प्रमुख हिस्सा रहे हैं। पहिए वाले संस्करण से सड़कों पर बेहतर गतिशीलता और तेज आवाजाही की उम्मीद है, जबकि ट्रैक वाला संस्करण सड़कों से दूर दुर्गम इलाकों के लिए अधिक उपयुक्त है। दोनों को पैदल सैनिकों को सुरक्षित पहुंचाने और लड़ाई में सहायता देने के लिए तैयार किया गया है।
विक्रम VT-21 में स्वदेशी रूप से विकसित 30 मिमी का मानवरहित टर्रेट है, जिसे संचालित करते समय चालक दल वाहन के सुरक्षित बख्तरबंद ढांचे के भीतर रह सकता है। इसमें मुख्य हथियार के समानांतर लगी 7.62 मिमी की मशीनगन और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल दागने की क्षमता भी है।
वाहनों में गोलियों और विस्फोटों से बचाव के लिए STANAG स्तर 4 और 5 की सुरक्षा देने वाला मॉड्यूलर कवच लगाया गया है। हाइड्रोजेट पानी में इन्हें चलने में मदद करते हैं। अधिक शक्ति वाले डीजल इंजन और ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन से वजन के अनुपात में ऊंची इंजन शक्ति मिलती है। फिलहाल इनमें स्वदेशी सामग्री और प्रणालियों की हिस्सेदारी करीब 65 प्रतिशत है, जिसे बढ़ाकर 90 प्रतिशत करने की योजना है।
मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जर्मनी के प्यूमा, स्वीडन के CV90 परिवार, अमेरिका के ब्रैडली और दक्षिण कोरिया के K21 जैसे आधुनिक लड़ाकू वाहनों में केवल कवच और हथियारों पर निर्भर रहने के बजाय सुरक्षा, मारक क्षमता, निगरानी और संचार प्रणालियों को एक साथ जोड़ने पर जोर दिया जाता है। विक्रम VT-21 को भी अधिक जटिल और हाइब्रिड युद्ध की ऐसी ही जरूरतों को पूरा करने के लिए विकसित किया जा रहा है।
यह कार्यक्रम विकास-सह-उत्पादन भागीदार (DCPP) मॉडल पर आधारित है। इसमें DRDO की डिजाइन और अनुसंधान विशेषज्ञता को निजी उद्योग की विनिर्माण क्षमता से जोड़ा गया है। सफलतापूर्वक सेना में शामिल होने पर इससे देश में बख्तरबंद वाहनों के उत्पादन, गुणवत्ता और बड़े पैमाने पर स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता को मजबूती मिलने तथा आयातित तकनीक पर निर्भरता घटने की उम्मीद है।
दोनों संस्करण रक्षा मंत्रालय की तकनीकी मूल्यांकन समिति की जांच पहले ही पार कर चुके हैं। यह मूल्यांकन पहिए वाले बख्तरबंद लड़ाकू वाहन और फ्यूचर इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल (FICV) कार्यक्रमों के तहत हुआ था। अब अलग-अलग भूभागों में सेना के परीक्षण तय करेंगे कि ये वाहन भारत की विविध परिचालन जरूरतों पर कितने खरे उतरते हैं।