प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़े ‘डिजिटल अरेस्ट’ ठगी नेटवर्क से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच में मुंबई के वकील रशेश भरतकुमार उपाध्याय को गिरफ्तार किया है। ईडी के अनुसार, इस नेटवर्क से जुड़े खातों में करीब 28,000 करोड़ रुपये के बैंकिंग लेनदेन हुए हैं। उपाध्याय पर ठगी की शिकायतों के बाद फ्रीज किए गए बैंक खातों से रोक हटवाने के लिए रिश्वत का इंतजाम करने का आरोप है।
रशेश शाह के नाम से भी जाने जाने वाले उपाध्याय को ईडी के पणजी जोनल कार्यालय ने 24 अक्टूबर 2026 को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत गिरफ्तार किया। उन्हें मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बोर्डिंग गेट पर रोका गया। वह तड़के दिल्ली जाने वाली कनेक्टिंग उड़ान में सवार होने की कोशिश कर रहे थे और उनके पास वापसी की बुकिंग नहीं थी।
उन्हें तलाशने और पकड़ने में मुंबई कस्टम्स तथा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) ने मदद की। उत्तरी गोवा की विशेष पीएमएलए अदालत ने उन्हें 29 अक्टूबर 2026 तक ईडी की हिरासत में भेज दिया। इस मामले में यह सातवीं गिरफ्तारी है।
जांच की शुरुआत उत्तरी गोवा के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में 9 जून 2025 को दर्ज एफआईआर से हुई थी। आरोप है कि जालसाजों ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) और सीबीआई के अधिकारी बनकर गोवा की एक महिला और उसके पति को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के जाल में फंसाया। दंपती को लगातार वीडियो निगरानी में रखा गया और सुप्रीम कोर्ट का फर्जी आदेश दिखाया गया। दबाव डालकर उनसे 21 मई से 2 जून 2025 के बीच 2,60,33,634 रुपये ऐसे खातों में भेजवाए गए, जिन्हें ‘गुप्त निगरानी खाते’ बताया गया था।
यह रकम तेजी से 400 से अधिक ऐसे खातों में घुमाई गई, जिनका इस्तेमाल दूसरों के नाम पर धन के लेनदेन के लिए किया जा रहा था। ये खाते कमोडिटी, ट्रेडिंग, यात्रा और विदेशी मुद्रा कारोबार से जुड़ी इकाइयों के थे। इन इकाइयों का नियंत्रण नाममात्र के निदेशकों के जरिए किया जा रहा था।
ईडी के मुताबिक, व्यापक नेटवर्क में करीब 28,000 करोड़ रुपये के बैंकिंग लेनदेन हुए। पहले के अनुमानों में यह आंकड़ा 27,850 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया था। खातों में करीब 2,900 से 2,904 करोड़ रुपये नकद भी जमा किए गए, जिनमें बड़ी रकम थोक में नोट स्वीकार करने वाली मशीनों के जरिए डाली गई थी।
नेटवर्क से जुड़े खातों का उल्लेख 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पीड़ितों की 300 से अधिक शिकायतों और 160 से ज्यादा एफआईआर में सामने आया है। कुछ रिपोर्टों में 330 शिकायतें और 163 एफआईआर बताई गई हैं। इन मामलों में कुल दर्ज नुकसान 400 करोड़ रुपये से अधिक है; ईडी के एक पहले आंकड़े में यह 417.49 करोड़ रुपये था। एजेंसी के अनुसार, अपराध से मिली रकम नकद निकाली गई और आरबीआई से लाइसेंस प्राप्त मुद्रा विनिमय कारोबारियों के जरिए विदेशी मुद्रा में बदली गई। नेटवर्क के कथित संचालक फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सैयद को 23 अगस्त 2026 को गिरफ्तार किया गया था।
ईडी ने उपाध्याय को नेटवर्क की अहम कड़ी और खातों पर लगी रोक हटवाने वाला व्यक्ति बताया है। आरोप है कि शिकायतों के बाद जांच एजेंसियां जब खाते फ्रीज करती थीं, तब वह कुछ संदिग्ध अधिकारियों तक नकद रिश्वत पहुंचाकर रोक हटवाने का इंतजाम करते थे। इसके लिए अंगड़ियों यानी निजी तौर पर नकदी पहुंचाने वाले अनौपचारिक मध्यस्थों का इस्तेमाल किया जाता था। उन पर रिश्वत की रकम तय करने, नकदी लेने की जगह निर्धारित करने और आगे भुगतान पहुंचाने में समन्वय करने का आरोप है।
एजेंसी के अनुसार, उपाध्याय ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने अलग-अलग एजेंटों के लिए करीब 100 खातों से रोक हटवाने में मदद की। एक मामले में 60 लाख रुपये से अधिक का भुगतान हुआ था। आरोप है कि ईडी की तलाशी के बाद भी वह यह काम करते रहे, जिसमें खुद ईडी की ओर से फ्रीज किए गए खाते भी शामिल थे।
ईडी का यह भी आरोप है कि रवाना होने की कोशिश से पहले उपाध्याय ने सह-आरोपियों के साथ हुई चैट मिटा दी और अपने सभी ज्ञात मोबाइल नंबर बंद कर दिए। एजेंसी ने कहा कि वकील के तौर पर पंजीकृत होने के बावजूद उन्होंने किसी आरोपी या उनकी कंपनियों की ओर से न अदालत में पैरवी की, न वकालतनामा दाखिल किया। ईडी का कहना है कि रिश्वत या धोखाधड़ी में मदद जैसे गैरकानूनी उद्देश्यों के लिए किए गए संवाद को वकील और मुवक्किल के बीच गोपनीयता का संरक्षण नहीं मिलता।
इस मामले में पहले गिरफ्तार किए गए अन्य लोगों में बैंकिंग एंट्री उपलब्ध कराने और खातों से रोक हटवाने में शामिल एजेंट भी हैं। ईडी अब कथित तौर पर रिश्वत लेने वाले अधिकारियों की पहचान करने, अंगड़ियों और अन्य मध्यस्थों का पता लगाने तथा अपराध से अर्जित पूरी रकम के लेनदेन की कड़ियां जोड़ने में जुटी है।