सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नौसेना की कमांडर सीमा चौधरी को स्थायी कमीशन देने से इनकार करने वाला चयन बोर्ड का फैसला रद्द कर दिया है। अदालत ने बुधवार को आदेश दिया कि छह सप्ताह के भीतर उनके मामले का नए सिरे से आकलन किया जाए। चौधरी नौसेना की जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) शाखा में 2007 बैच की शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने चयन बोर्ड के 12 अप्रैल, 2024 के फैसले में खामियां पाईं। पीठ के अनुसार, बोर्ड ने चौधरी की अनुकूल वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों (एसीआर) पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया और उन पुराने मामलों को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया, जिनमें वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थायी कमीशन के लिए उनकी सिफारिश नहीं की थी।
अदालत ने कहा कि सिफारिश न किए जाने के आधार पर रिपोर्टों में दर्ज समग्र मूल्यांकन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन रिपोर्टों में उनका प्रदर्शन उच्च स्तर का बताया गया था। पीठ ने यह भी गौर किया कि अधिकांश एसीआर में चौधरी को पदोन्नति के लिए जरूरी ग्रेडिंग मिली थी। उसने सवाल उठाया कि पदोन्नति के निर्धारित मानदंड पूरे करने वाली अधिकारी को स्थायी कमीशन के लिए अनुपयुक्त कैसे माना जा सकता है।
पीठ ने विशेष निर्देश दिया कि 14 जुलाई, 2008 से 31 अक्टूबर, 2014 की अवधि की जिन एसीआर में स्थायी कमीशन की सिफारिश वाला कॉलम खाली छोड़ा गया था, उन्हें सकारात्मक सिफारिश वाली रिपोर्ट माना जाए। वर्ष 2013 और 2014 में चौधरी के लिए स्थायी कमीशन की सिफारिश की गई थी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि वह उनके पूरे सेवाकाल की हर एसीआर पर विचार करने का आदेश नहीं दे रही है। उसके निर्देशों के दायरे में सक्षम अधिकारी तय करेंगे कि किन रिपोर्टों का परीक्षण किया जाना है।
अदालत ने अप्रैल 2024 के आकलन में दो प्रमुख गलतियां बताईं। पहली, वर्ष 2015 से 2021 की उन एसीआर पर निर्भरता, जिनमें स्थायी कमीशन की सिफारिश दर्ज नहीं थी। दूसरी, अत्यंत संतोषजनक प्रदर्शन के बावजूद यह निष्कर्ष निकालना कि चौधरी के पास आवश्यक ग्रेडिंग नहीं थी।
सेवा रिकॉर्ड और स्थायी कमीशन की लड़ाई
सीमा चौधरी को 6 अगस्त, 2007 को नौसेना की जेएजी शाखा में शॉर्ट सर्विस कमीशन मिला था। वह 6 अगस्त, 2009 को लेफ्टिनेंट और 6 अगस्त, 2012 को लेफ्टिनेंट कमांडर बनीं। नवंबर 2016 और अगस्त 2018 में उन्हें सेवा विस्तार मिला। वर्ष 2019 में वह अपने बैच की पहली अधिकारी बनीं जिन्हें कमांडर रैंक पर पदोन्नति मिली। अगस्त 2020 में उन्हें सूचित किया गया कि अगस्त 2021 में उन्हें सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा।
चौधरी उन महिला अधिकारियों में शामिल थीं जिनकी याचिकाओं पर मार्च 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘भारत संघ बनाम लेफ्टिनेंट कमांडर एनी नागराजा’ मामले में फैसला दिया था। अदालत ने नौसेना की 2008 की उस नीति को खारिज कर दिया था, जिसमें महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का प्रावधान केवल आगे के लिए और कुछ शाखाओं तक सीमित था। अदालत ने शिक्षा, विधि और लॉजिस्टिक्स संवर्गों में सेवारत सभी महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों को स्थायी कमीशन के लिए विचार के दायरे में लाने का निर्देश दिया था।
पहले भी तीन बार खारिज हो चुका है दावा
चौधरी का स्थायी कमीशन का दावा पहले तीन बार खारिज हो चुका है। वर्ष 2020 में नौसेना ने रिक्तियां नहीं होने का आधार दिया था। इसके बाद सशस्त्र बल अधिकरण के निर्देश पर उनका आकलन 2011 और 2014 बैच के अधिकारियों के साथ किया गया, जिसमें उन्हें तुलनात्मक मेरिट में नीचे पाया गया।
फरवरी 2024 में उनकी पुनर्विचार याचिका पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने माना कि उनके साथ अन्याय हुआ था। अदालत ने चयन बोर्ड को दोबारा गठित कर उनका अलग से आकलन करने का आदेश दिया। यह आकलन पुराने फैसलों या सशस्त्र बल अधिकरण की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना किया जाना था। पीठ ने यह भी दर्ज किया कि वह 2007 बैच की एकमात्र सेवारत जेएजी अधिकारी थीं। जरूरत पड़ने पर एक बार के उपाय के रूप में अनुच्छेद 142 के तहत रिक्तियों में आनुपातिक वृद्धि की अनुमति भी दी गई थी।
चयन बोर्ड ने 12 अप्रैल, 2024 को उनका दावा फिर खारिज कर दिया। इसके बाद चौधरी ने अवमानना याचिका दायर की। उनका आरोप था कि फैसले में फरवरी 2024 के निर्देशों की अनदेखी की गई और यह व्यवस्था में मौजूद पक्षपात को दिखाता है। मई 2025 में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने नौसेना के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई थी। पीठ ने कहा था कि ‘अब बहुत हो चुका’ और अधिकारियों से अपना अहंकार छोड़ने को कहा था।
नौसेना की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने दलील दी कि स्थायी कमीशन का फैसला तुलनात्मक मेरिट और अधिकारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड के समग्र आकलन पर आधारित होना चाहिए। उनका कहना था कि अलग से आकलन करने का अर्थ लगातार सिफारिश न किए जाने की अनदेखी करना नहीं है। सेवा विस्तार या अनुकूल रिपोर्टों से स्थायी कमीशन का स्वतः अधिकार भी नहीं बनता।
अदालत ने इन दलीलों के बावजूद अप्रैल 2024 के फैसले में गंभीर त्रुटियां पाईं। अब चयन बोर्ड को दोबारा बैठक कर अदालत की टिप्पणियों और निर्देशों के अनुसार चौधरी के दावे पर विचार करना होगा। यह उनके स्थायी कमीशन के दावे का चौथा आकलन होगा।